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आत्मा की शुद्धि ब्रह्म ज्ञान से और धन की शुद्धि दान से होती है : निर्विकल्प स्वरूप जी

सिवनी 12 मार्च 2023
सिवनी यशो:- भगवान प्रेम के वशीभूत सगुण साकार होते है, अनिष्ट की निवृति के लिए दान आवश्यक है।
उक्ताशय के उद्गार गीता मनीषी पूज्य ब्रह्मचारी श्री निर्विकल्प स्वरूप जी के मुखारविंद से, स्मृति लान बाहुबली चौक सिवनी में आयोजित श्री मद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ, के पांचवे दिवस कथा प्रसंग में प्रवाहित हुए।
जिले की जीवनदायनी माँ बेनगंगा की परिक्रमा करने वाले एक मात्र संत तथा द्विपीठाधीश्वर जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज के परम स्नेह शिष्य ब्रह्मचारी निर्विकल्प स्वरूप जी महाराज ने कहा कि भगवान भक्तों के आधीन रहते है, वे अपने भक्तों का कल्याण करने के लिए मनुष्य रूप धारण कर भारत भूमि में अवतार लेते है, वैसे तो भगवान निर्गुण निराकार हैं लेकिन अपने भक्तों के प्रेम में सगुण साकार हो जाते हैं, और उस प्रेम में वशीभूत हो प्रकट हो जाते हैं जैसे अग्नि सब जगह है किन्तु जब घर्षण होता है तब ही अग्नि प्रकट होती है, उसी प्रकार जब भक्तों के द्वारा भगवान के प्रति प्रेम रूपी घर्षण होता हैं तो परमात्मा प्रकट हो जाते हैं।
ब्रह्मचारी जी ने कहा कि धन की तीन गति होती है दान-भोग-नाश इनमें से सबसे ऊपर दान है दान देने के लिए जितना अंश हम निकाल कर दे देते हैं ओर जो धन बचा रहता है वो शुद्ध हो जाता है,और अनिष्ट की निवृति के लिए भी दान दिया जाना चाहिए,कोई अनिष्ट होने वाला होता तो दान करने से पुण्य भी होता है।प्रारब्ध के अनुसार यदि किसी पर संकट आ जाए तो उसमें उसकी रक्षा हो जाए इसीलिए भी दान दिया जाता है ब्रह्मचारी जी ने बताया कि मेहनत से कमाए हुए धन का दान करोगे तो ज्यादा पुण्य मिलेगा, बेईमानी से लिए हुए धन का दान करोगे तो पुण्य नही मिलेगा, अर्थात बेईमानी का करोड़ रुपया की अपेक्षा ईमानदारी का एक रुपया भी ज्यादा फल दायी होता है।
आज की कथा में ब्रह्मचारी जी ने भगवान श्री कृष्ण की बाल लीलाओं के साथ पूतना उद्धार,शकटभङ्ग, तृणावर्त, ज्रिम्भमाणस्य, वत्सासुर, वृकासुर, अघासुर ओर धेनुकासुर आदि के उद्धार का प्रसंग सुनाया तथा अंत मे गोवर्धन प्रसंग
में 56 भोग का दर्शन करवाया।

Dainikyashonnati

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