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आदिवासी बालक उत्कृष्ट छात्रावास हर्रई में अधीक्षक पर गंभीर आरोप, मासूम बच्चों की जान से खिलवाड़

Dainik Yashonnati

Dainik Yashonnati / Sep 27, 2025 01:38 pm / Post views : 237

आदिवासी बालक उत्कृष्ट छात्रावास हर्रई में अधीक्षक पर गंभीर आरोप, मासूम बच्चों की जान से खिलवाड़
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हर्रई, (मध्यप्रदेश)। जिले के आदिवासी बालक उत्कृष्ट छात्रावास हर्रई के अधीक्षक काशीराम डेहरिया पर मासूम बच्चों की जान से खिलवाड़ करने का गंभीर आरोप लगा है। सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में अधीक्षक को बच्चों को छड़ी दिखाकर डराते हुए और छात्रावास की छत पर चढ़ाकर सफाई व अन्य कार्य करवाते हुए देखा गया है। इस घटना ने छात्रावास प्रबंधन और बच्चों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

आरोप: निजी काम करवाने का सिलसिला

सूत्रों के मुताबिक अधीक्षक बच्चों को लंबे समय से निजी सेवा और छात्रावास के छोटे-मोटे कामों के लिए दबाव डालते रहे हैं। वीडियो में दिख रहा है कि वे बच्चों को छड़ी के बल पर छत पर चढ़ाकर सफाई करवा रहे हैं। इस दौरान बच्चों की सुरक्षा के लिए कोई व्यवस्था नहीं की गई, जिससे किसी भी समय बड़ा हादसा हो सकता था।

कानूनी उल्लंघन भी स्पष्ट

यह घटना बाल अधिकारों का खुला उल्लंघन है।

किशोर न्याय अधिनियम, 2015: बच्चों पर किसी भी प्रकार की क्रूरता को अपराध मानता है।

बाल श्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986: 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को किसी भी जोखिमभरे कार्य में लगाने पर रोक।

शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009: बच्चों का प्रमुख कार्य शिक्षा है, उन्हें ऐसे काम में नहीं लगाया जा सकता जो शिक्षा में बाधक हो।

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मध्यप्रदेश आदिवासी छात्रावास नियम: अधीक्षकों को बच्चों की सुरक्षा व कल्याण सर्वोपरि मानकर कार्य करना अनिवार्य है

प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल

जानकारी के अनुसार, सहायक आयुक्त सतेंद्र सिंह मरकाम के कार्यकाल में जिले के छात्रावासों में पहले भी अव्यवस्था, बच्चों की मौत और शोषण जैसी घटनाएँ सामने आ चुकी हैं।

इसके बावजूद अधीक्षकों को संरक्षण मिलने के आरोप लगते रहे हैं।

इस घटना ने फिर से छात्रावासों की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

अधीक्षक की सफाई नहीं

इस मामले में जब अधीक्षक काशीराम डेहरिया से संपर्क करने की कोशिश की गई, तो उन्होंने फोन नहीं उठाया।

विशेषज्ञों की राय

बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि-

यह घटना सिर्फ एक अधीक्षक की लापरवाही नहीं बल्कि पूरे तंत्र की कमजोरी है।

यदि दोषियों पर कड़ी कार्रवाई नहीं की गई,

तो छात्रावासों में बच्चों का भविष्य और सुरक्षा दोनों खतरे में रहेंगे।

 निष्कर्ष

आदिवासी छात्रावासों की स्थिति पर यह मामला एक बार फिर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।

मासूम बच्चों को सुरक्षित माहौल देना सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है,

लेकिन यदि संरक्षण देने वाले ही खतरा बन जाएँ तो सवाल उठना स्वाभाविक है।

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