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शिक्षा माफियाओं से शिक्षा व्यवस्था को मुक्त कराने सरकार उठा सकती है कठोर कदम

शिक्षा माफियाओं से शिक्षा व्यवस्था को मुक्त कराने सरकार उठा सकती है कठोर कदम
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शिक्षा के क्षेत्र में माफियाओं की मजबूत जड़े, शिक्षा व्यवस्था के लिये बन रहा अभिशाप इन मजबूत जड़ो पर मठ्ठा डालने का सरकार को दिखाना चाहिये साहस

मध्यप्रदेश (Madhya Pradesh) में मुख्यमंत्री डाँ. मोहन यादव (Chief Minister Dr. Mohan Yadav)के निर्देश पर इन दिनों प्रशासन माफिया की तलाश कर रहा है। यह किसी एक क्षेत्र का नहीं बल्कि अनेक क्षेत्र में ऐसे लोगों को चिन्हित किये जा रहे है जो नियमों को दरकिनार कर खुद के लाभ के लिए काम कर रहे हैं। अनेक ऐसे व्यवसायिक क्षेत्र है जिन पर माफियों की गहरी पैठ है और इन माफियों के कारण जहाँ आम जनता का शोषण होता है वहीं शासन को राजस्व का चूना भी लगता है । कुछ तो ऐसे क्षेत्र है जिनका व्यवसायीकरण (commercialization) करने का प्रावधान (Provision) भी नहीं है, इसे क्षेत्रों में समाज सेवा (Social service) के नाम पर माफिया कब्जा किये हुये है, ऐसे क्षेत्रों में शिक्षा का क्षेत्र ऐसा है जिसका व्यवसायीकरण नहीं किया जा सकता परंतु पूरे प्रदेश में संचालित प्राइवेट स्कूल (private school) शासन के नियम कायदों को ताक पर रखकर व्यवसायिक रूप से संचालित हो रहे है । शिक्षा पर माफियाओं का कब्जा अभिभावको के शोषण का बड़ा माध्यम बना हुआ है । जिस प्रकार से भू- माफियाओं, अवैध कालोनाईजरो, मिलाटखोरो, शराबमाफिओं, रेत माफियाओं सहित अन्य माफियाओं पर कार्यवाही हो रही है । आगामी समय में शिक्षा माफियाओ (education mafia) पर भी बड़ी कार्यवाही हो सकती है । शिक्षा के क्षेत्र में लगे बाजारवाद के घुन ने पूरी शैक्षिक व्यवस्था (educational system) को बदल कर रख दिया है। सेटिंग से स्कूलों को मान्यता (Recognition) के खेल ने शिक्षा माफियाओं को करोड़पति बना दिया, बच्चे के अच्छे भविष्य की लालच में अभिभावकों की जेब पर डाका (pickpocket) पड़ रहा है। निजी स्कूलों ने जो कमाई का फंड़ा बना रखा है। इससे बच्चों का भविष्य कहां जा रहा है यह कहना मुश्किल है। इसी बात से सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि जबलपुर कलेक्टर (Jabalpur Collector) ने नियमों का पालन करने में मनमानी करने वाले स्कूलों पर कार्यवाही (action on schools) की 11 स्कूलों के खिलाफ एफआईआर दर्ज (FIR registered) की गई, जिनमें इन स्कूलों के 80 व्यक्तियों को दोषी बनाया गया है। इन स्कूलों ने न केवल नियमों की अवहेलना करते हुए फीस बढ़ाई बल्कि यूनीफॉर्म, पुस्तकें और स्टेशनरी (Uniforms, Books and Stationary) निर्धारित दुकानों से खरीदने के लिए दबाव डाला। जबलपुर कलेक्टर के आदेश पर हुई जांच में 125 करोड़ रुपये का घोटाला होने की बात सामने आई है। स्कूल प्रबंधकों को नियम विरुद्ध वसूली गई फीस 30 दिनों में अभिभावकों को लौटाने के निर्देश दिए हैं। स्कूल प्रबंधक राशि नहीं लौटाते हैं तो उनके खिलाफ कुर्की (attachment) की कार्रवाई होगी। 22 लाख रुपये का अर्थदंड (penalty) भी लगाया है। जबलपुर में शिक्षा माफियाओं पर शिंकजा कसने की कार्यवाही इसी बात के संकेत है कि आगामी समय में पूरे प्रदेश में इस प्रकार की कार्यवाही संभव है ।

शिक्षा के क्षेत्र में माफिया की मजबूत जड़ो पर मठ्ठा डाल सकती है मोहन सरकार

हालांकि शिक्षा माफियाओं पर कार्रवाई करने की अब तक प्रशासन ने कोई योजना नहीं बनाई है, परंतु निजी स्कूलों को मान्यता देने संबंधी नियम पहले से ही इतने सक्षम है कि जिला शिक्षा अधिकाारी (District Education Officer) उन पर ईमानदारी से काम करे तो जिले में संचालित होने वाले आधे से अधिक प्राइवेट स्कूल केवल इसलिये बंद हो जायेगे कि उनके पास इतनी भूमि नहीं है जितनी मान्यता देने के लिये आवश्यक होती है । मान्यता के लिये आवश्यक होता है कि जो विद्यालय संचालित हो रहे है वहाँ आवश्यक विषयों के प्रशिक्षित शिक्षक हो, जिसकी शिक्षा विभाग अनदेखी करता है । हर साल हजारों की संख्या में छात्र और अभिभावक शिक्षा माफिया के चंगुल में फंसकर मोटी रकम दे रहे हैं। शिक्षा माफिया अभिभावको को अलग-अलग तरह से चूना लगाने का काम कर रहा है। पहले तो नियम विरुद्ध तरीके से शिक्षण संस्थान खोले जाते हैं, उसमें प्रशासनिक अधिकारियों की मिलीभगत से उन मापदंडों को पूरा किए बिना ही अनुमति ले लेते हैं ।

ऐसे भी खोलते है प्राइवेट स्कूल

हर नए शिक्षा सत्र में निजी स्कूल खुल जाते हैं। बाकायदा वह मान्यता भी दिखा देते हैं। बात समझ से परे है कि रातोरात मान्यता कैसे मिल जाती है, जबकि मान्यता संबंधी मानक इनके द्वारा पूरे नहीं किया जाते । शहर में आधा सैकड़ा से अधिक निजी स्कूल अभिभावकों से मोटी फीस वसूल रहे हैं जबकि मानक के नाम पर स्कूलों के पास स्वयं का भवन नहीं है । कुछ तो सरकारी कर्मचारी अधिकारी और सेठ महाजन स्कूल केवल इसलिये खोल देते है कि उनके यहाँ कि महिलाओं का समय नहीं कटता और वे मुहल्ले के बच्चों को पढ़ाने के लिये अंग्रेजी माध्यम का स्कूल खोल देते है। मोहल्ले वाले भी स्कूल में इसलिये अपने बच्चे का दाखिला करा देते है कि उनके बच्चे को स्कूल पास पड़ेगा और यहीं कमजोरी अभिभावको के लिये भारी पड़ती है और स्कूल खोलने वाले का लालच बढ़ते जाता है । स्कूल में पढऩे वाले बच्चे से मोटी प्रवेश फीस लेने के बाद स्कूल की यूनिफार्म, पुस्तक कापियों में कमीशन सहित मनमानी परीक्षा फीस और हर साल फीस बढाने का सिलसिला चल पड़ता है । इसके साथ ही अधिकारियों से सैटिंग कर आर टी ई के तहत कुछ छात्रों का प्रवेश ले लेते हँ । अधिकतर में न तो खेल का मैदान है और न ही मानक के अनुरूप कक्षा। बच्चों का प्रवेश भारी भरकम फीस लेकर कर दिया जाता है और इसी प्रकार के स्कूल संचालक जो अपनी घर की महिलाओं के टाईम पास के लिये स्कूल खोलते है यह कुछ ही समय में बड़े उद्योग का रूप ले लेता है ।

विषय विशेषज्ञ के नाम पर फर्जीवाड़ा

इन स्कूलों में अभिभावको का शोषण ट्युशन के नाम पर भी होता है । स्कूलों में कम वेतन वाले अप्रिशिक्षित शिक्षक रखे जाते है और शिक्ष्क स्कूलों में कम वेतन पर भी काम करने के लिये केवल इसलिये तैयार हो जाते है कि इन्हें शिक्ष्क के रूप में पहचान मिल जाये और वे ट्यूशन का कारोबार शुरू कर दें और होता भी यही है । स्कूल प्रबंधन इस बात का कोई ध्यान नहीं देते कि स्कूल में प्रशिक्षित रखने का प्रावधान है अप्रशिक्षित शिक्षकों की भर्ती कर उन्हें कम वेतन दिया जाता है और कागजो में अधिक शो किया जाता है । अनेक स्कूलों की सूक्ष्मता से जाँच की जाये तो स्पष्ट हो जायेगा कि उनके यहाँ जो शिक्षक पढ़ा रहे है वे उस विद्यालय के कर्मचारी ही नही है , उनके स्थान पर किसी योग्य प्रशिक्षित शिक्षक का नाम होगा । विषय विशेषज्ञों के नाम पर भारी फर्जीवाड़ा होता है । जो शिक्षक पढ़ा रहे है उन्हें दिया तो चार हजार जाता है परंतु इनके एवज में कागजों में दर्शाये जाने वाले विषय विशेषज्ञ के नाम चालीस हजार रूपये की एंट्री होती है जो सीधे स्कूल संचालक की जेब में अनैतिक तरीके से जाती है और शिक्षा के क्षेत्र में यही फर्जीवाड़ा (fraud) स्कूल संचालको की कमाई का सबसे सशक्त माध्यम है ।

बस्ते के बोझ पर नजर

पहले छोटी कक्षाओं में गणित, अंग्रेसी, हिन्दी, सामान्य ज्ञान व विज्ञान की पुस्तक पढ़ाई जाती थी। कक्षा के स्तर बढऩे के साथ किताब व विषय बढ़ते थे। जबकि अब प्रतिस्पर्था की दौड़ में छोटी कक्षा में ही बच्चों को 10 विषय पढ़ाए जा रहे हैं इससे बस्ते का बोझ बढ़ रहा है। साथ ही बच्चों को पढ़ाई बोझिल लगने लगी है। इन विषयों के साथ ही इन्हें प्रोजेक्ट और कंप्युटर शिक्षा की अनिवार्यता बता कर स्कूल को हाई फाई दिखाने की कोशिश होती है और छोटी कक्षाओं में ही बच्चे के दिमाग पर इतना बोझ डाला जाता है कि उन्हें मानसिक विकास करने का अवसर नहीं मिल पाता और वे संकुचित हो जाते है ।  

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