सत्कर्म करिए, सौभाग्यशाली बनिए।दुष्कर्म करिए और भाग्य को भयानक बना लीजिएयह सर्वथा अपने हाथ की बात है। इसका संबंध अन्य किसी दृश्य अथवा अदृश्य शक्ति व सहयोग से नहीं है।भाग्य- निर्माण के लिए जिस कर्मपथ का निर्माण करना होता है वह भी मनुष्य को स्वयं ही बनाना होगा ।उसका यह कार्य भी किसी दूसरे पर निर्भर होकर नहीं हो सकता।भगवान ने मनुष्य को इतनी स्वाधीनता, क्षमता और शक्ति देकर ही इस कर्मभूमि में भेजा है कि वह अपने लिए उपयोगी तथा अनुकूल परिस्थितियों का स्वयं सृजन कर सके।मनुष्य अन्य जीव-जंतुओं की तरह इस विषय में न तो विवश है और ना पराधीन। अपना कर्त्तव्य-पथ बनाने और उस पर चलकर लक्ष्य तक पहुंचने के लिए मनुष्य को पूर्णतया आत्मनिर्भर ही होना पड़ेगा। दूसरों पर निर्भर होकर वह अपने ध्येय की पूर्ति नहीं कर सकता।उस व्यक्ति को इस संसार में कोई नहीं जीत सकता, जिसके जीवन रथ में शौर्य और धैर्य के पहिए लगे हो*सत्य, शील और दृढ़ता की पताका हो, बल, विवेक, परोपकार और इंद्रियदमन के चार घोड़े जुड़े हो, क्षमा और दया से वे नियंत्रित हो । जीवन-रथ का सारथी है ईश्वर-भजन , वैराग्य की ढाल और संतोष की कृपाण होदान, विज्ञान, अचल मन, यम, नियम आदि अनेक अस्त्रों से सुसज्जित होकर जो जीवन-संग्राम में उतरते है, उन्हीं की इस संसार में जीत होती है..!!संकलनअनुराग अग्रवालAstrologer, Numerologist & Vastu Expertजय श्रीकृष्ण