एशिया का सबसे बड़ा मेला
क्षेत्रीय आदिवासी परंपरा का यह मेला एशिया का सबसे बड़ा मेघनाद मेला है ऐसा दावा किया जाता है । इस ऐतिहासिक मेले की खासियत यह है कि इसमें अनेक ग्रामों और जिलों के आदिवासी एकत्रित होते है ।
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खंभा होता है पूजा का प्रतीक
यूं तो मेघनाद की कोई प्रतिमा नहीं है लेकिन पूजा के प्रतीक के रूप में 60 फीट ऊंचाई वाले खंभें को गांव के बाहर गाड़ा जाता है। वहीं, इस खंभे पर चढऩे के लिए लगभग 30 फीट की खूंटी लगाई जाती हैं। एक तरह से यह मचान तैयार हो जाती है। जिस पर तीन लोगों के बैठने की व्यवस्था की जाती है। आदिवासी इसी खंभे के नीचे पूजा अर्चना करते हैं।
मनोकामनाएँ होती है पूरी
आदिवासी समाज के लोग मेघनाद पूजा पर अनेक प्रकार की मन्नते मानते है और मन्नत पूरी होने पर एक 60 फिट के खंभे पर उन्हें आदिवासी पुजारियों द्वारा लटका कर घूमाया जाता है जो विशेष आकर्षण का केन्द्र तो होता ही है देखने वाले इस तरह के दृश्य से आश्चर्यचकित भी होते है ।
मेघनाद मेले में मनोकामना पूरी होने पर एक खास रस्म को पूरा किया जाता है। जिन महिला-पुरुषों की मनोकामना पूरी होती है उनको मचान पर ले जाकर पेट के सहारे लिटाया जाता है। इसके बाद खम्भे के ऊपरी सिरे में लगी चारों तरफ घूमने वाली लकड़ी से बांधकर घुमाया जाता है। अपनी मन्नतों के आधार पर उसे 60 फीट ऊंचे मंच में घूमना होता है जो मेले का बड़ा आकर्षण होता है। झूलते समय मन्नत वाले व्यक्ति के ऊपर से नारियल फेंका जाता है। इस दौरान आदिवासी हक्कड़े बिर्रे का जयघोष करते हुए वातावरण को गुंजायमान करते हैं। इस आयोजन में दूर-दूर से लोग मेले का आनंद उठाने बड़ी संख्या में पहुंचे।