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तेजस्वी महापुरुषों के अवतार से ही देवभूमि भारत ज्ञान गुरु के रूप में प्रतिष्ठित है

Dainik Yashonnati

Dainik Yashonnati / Aug 25, 2025 12:35 am / Post views : 855

तेजस्वी महापुरुषों के अवतार से ही देवभूमि भारत ज्ञान गुरु के रूप में प्रतिष्ठित है
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जन्म और बाल्यकाल

देवभूमि भारत में समय-समय पर अनेक तेजस्वी महापुरुषों ने जन्म लेकर देश और धर्म को दिशा दी है।

इन्हीं अवतारी पुरुषों में से एक थे ज्योतिष पीठ और द्वारका शारदा पीठ के द्विपीठाधीश्वर ब्रह्मलीन जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज।

आपका जन्म भाद्रपद शुक्ल तृतीया (2 सितंबर 1924) को सिवनी जिले के ग्राम दिघोरी में हुआ।

पिता श्री धनपति उपाध्याय और माता गिरिजा देवी के संस्कारों ने आपके जीवन को प्रारंभ से ही आध्यात्मिक दिशा दी।

बचपन में आप "पोथीराम" के नाम से जाने जाते थे। मात्र 9 वर्ष की आयु में गृह त्याग कर तीर्थयात्रा और देशाटन पर निकल पड़े।

शिक्षा और वैराग्य

काशी में आपने स्वामी करपात्री जी महाराज और स्वामी महेश्वरानंद जी जैसे महान आचार्यों से वेद-वेदांत, शास्त्र और पुराणों का गहन अध्ययन किया।

भारत छोड़ो आंदोलन (1942) में आप क्रांतिकारी साधु के रूप में अग्रणी रहे और जेल भी गए।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद आपने "राम राज्य परिषद" के अध्यक्ष के रूप में समाज में रामराज्य की स्थापना का प्रयास किया।

शंकराचार्य पदाभिषेक

1973 में विद्वानों और संतों की सहमति से आप ज्योतिष पीठाधीश्वर अभिषिक्त हुए।

इसके बाद 1982 में वसीयत अनुसार आपको द्वारका पीठ की गद्दी भी प्रदान की गई।

इस प्रकार आप एक साथ दो पीठों पर विराजमान होने वाले पहले शंकराचार्य बने।

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समाज सेवा और आंदोलन

  • बिहार के सिंहभूम जिले में विश्व कल्याण आश्रम की स्थापना की,

  • जहाँ आज भी आदिवासियों को भोजन, दवाई और रोजगार मिलता है।

  • झोतेश्वर (गंगा आश्रम) में आध्यात्मिक उत्थान मंडल और त्रिपुर सुंदरी राजराजेश्वरी का भव्य मंदिर निर्मित कराया।

  • 1985 के अकाल में गुजरात के लिए 5 मालगाड़ियों से एक करोड़ का चारा पहुँचाया।

  • रामजन्मभूमि पुनरुद्धार आंदोलन में नेतृत्व किया और कई बार गिरफ्तारी दी।

  • संस्कृत विद्यालय, आयुर्वेद औषधालय, वृद्धाश्रम, गोशालाओं और शिक्षा संस्थानों की स्थापना कर समाज सेवा में जीवन समर्पित किया।

आध्यात्मिक साधना

आप श्रीविद्या साधना में लीन रहे और भगवती त्रिपुर सुंदरी की सात्विक उपासना का संदेश दिया। आपका संपूर्ण जीवन विश्वकल्याण, धर्मसंरक्षण और जनसेवा को समर्पित रहा।

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महापरिनिर्वाण

पूज्य शंकराचार्य जी महाराज 11 सितंबर 2022 को चिर समाधि में लीन हो गए। यद्यपि शरीर समाधिस्थ हुआ, लेकिन गुरु तत्व आज भी भक्तों के हृदय में दीपस्तंभ की तरह विद्यमान है।

श्रद्धांजलि

हम सभी सनातन धर्मावलंबी, पूज्य महाराज श्री के अवतरण दिवस पर कोटि-कोटि नमन करते हैं।

उनका जीवन संदेश हमें सदा धर्म, सेवा और साधना के मार्ग पर अग्रसर करता रहेगा।

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