मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: बिजली पाना जीवन के अधिकार का हिस्सा, 7 दिन में कनेक्शन देने के निर्देश
संपत्ति विवाद के चलते नहीं रोका जा सकता बिजली कनेक्शन, अनुच्छेद 21 और विद्युत अधिनियम की धारा 43 का दिया हवाला
MP हाईकोर्ट: बिजली पाना जीवन का अधिकार, 7 दिन में कनेक्शन
ग्वालियर/जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बिजली कनेक्शन को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि आधुनिक जीवन में बिजली के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। इसलिए बिजली जैसी बुनियादी सुविधा तक पहुंच का संबंध संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से है। अदालत ने स्पष्ट किया कि संपत्ति के स्वामित्व, बंटवारे या परिवार के सदस्यों के बीच चल रहे नागरिक विवाद के आधार पर ही किसी पात्र व्यक्ति को बिजली कनेक्शन देने से इनकार नहीं किया जा सकता।
जस्टिस मिलिंद रमेश फड़के की पीठ ने बिजली वितरण विभाग को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता के वर्तमान आवास पर आदेश की प्रति प्राप्त होने के सात दिनों के भीतर बिजली कनेक्शन जारी करे। हालांकि, कनेक्शन देने की प्रक्रिया लागू कानूनों, निर्धारित शर्तों और आवश्यक मानकों के अनुपालन के अधीन रहेगी।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला ग्वालियर की एक संपत्ति में अस्थायी घरेलू बिजली कनेक्शन काटे जाने से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने बिजली विभाग की कार्रवाई को चुनौती देते हुए बताया कि सिविल कार्यवाही के दौरान हुए समझौते के अनुसार विवादित संपत्ति में उसका सातवां हिस्सा है और वह अपने परिवार के साथ वहां निवास कर रही है।
याचिकाकर्ता के अनुसार, बाद में उसकी मां के साथ संपत्ति को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया। उसने आरोप लगाया कि उसकी मां ने उसके शांतिपूर्ण कब्जे में हस्तक्षेप किया और पानी तथा बिजली की आपूर्ति बाधित कराई।
याचिकाकर्ता को 20 अगस्त 2025 को अस्थायी घरेलू बिजली कनेक्शन दिया गया था। उसका कहना था कि वह नियमित रूप से बिजली बिल का भुगतान कर रही थी, लेकिन मां की शिकायत के बाद 27 अगस्त 2025 को कनेक्शन काट दिया गया। इसके बाद उसने नए कनेक्शन के लिए आवेदन किया।
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि बिजली नहीं होने से उसके परिवार को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। विशेष रूप से कक्षा 9वीं और 10वीं में पढ़ने वाले बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है।
बिजली विभाग ने क्या कहा?
बिजली विभाग की ओर से दलील दी गई कि जब तक याचिकाकर्ता संबंधित परिसर पर अपना अधिकार स्थापित नहीं कर देती, तब तक उसे नया बिजली कनेक्शन नहीं दिया जा सकता।
इसके विपरीत, याचिकाकर्ता ने विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 43 का हवाला देते हुए कहा कि कानून के तहत निर्धारित शर्तों को पूरा करने वाले परिसर के मालिक या कब्जाधारी को बिजली कनेक्शन उपलब्ध कराना वितरण प्राधिकरण का वैधानिक दायित्व है।
उसने अपने दावे के समर्थन में सिविल कार्यवाही के दौरान हुए समझौते से संबंधित दस्तावेज और पहले जारी किए गए बिजली बिल भी प्रस्तुत किए।
हाईकोर्ट ने संपत्ति विवाद पर क्या स्पष्ट किया?
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता और उसकी मां के बीच विवाद मुख्य रूप से संपत्ति में हिस्सेदारी, अधिकार और कब्जे से संबंधित है। बिजली कनेक्शन के आवेदन पर निर्णय लेते समय वितरण प्राधिकरण से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह संपत्ति के स्वामित्व या पक्षकारों के बीच जटिल नागरिक अधिकारों का अंतिम निर्धारण करे।
पीठ ने पुराने विद्युत अधिनियम, 1910 और विद्युत अधिनियम, 2003 के प्रावधानों की तुलना करते हुए नए कानून की शब्दावली पर भी विचार किया। अदालत ने माना कि संबंधित परिसर पर कब्जे में रहने के आधार पर याचिकाकर्ता धारा 43 के तहत बिजली कनेक्शन पाने का दावा कर सकती है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके आदेश का दायरा बिजली कनेक्शन पाने के अधिकार तक सीमित है। इससे संपत्ति के स्वामित्व, हिस्सेदारी या पक्षकारों के बीच चल रहे अन्य नागरिक विवादों का अंतिम फैसला नहीं माना जाएगा।
सात दिन में बिजली कनेक्शन देने का आदेश
हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए बिजली विभाग को आदेश की प्रति प्राप्त होने के सात दिनों के भीतर याचिकाकर्ता के वर्तमान आवास पर बिजली कनेक्शन जारी करने के निर्देश दिए। यह आदेश विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 43 के तहत लागू नियमों और आवश्यक शर्तों के पालन के अधीन है।
आम लोगों के लिए क्या है इस फैसले का महत्व?
इस फैसले से यह महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत सामने आता है कि संपत्ति को लेकर विवाद होना अपने आप में बिजली कनेक्शन से वंचित करने का पर्याप्त आधार नहीं है। यदि कोई व्यक्ति संबंधित परिसर पर कब्जे में है और कानून के तहत कनेक्शन पाने की पात्रता तथा आवश्यक शर्तें पूरी करता है, तो बिजली वितरण प्राधिकरण को उसके आवेदन पर नियमानुसार विचार करना होगा।
अदालत की टिप्पणी बिजली जैसी बुनियादी सुविधा और जीवन के अधिकार के संबंध को रेखांकित करती है। साथ ही, यह भी स्पष्ट करती है कि बिजली कनेक्शन देने का निर्णय और संपत्ति के वास्तविक स्वामित्व का विवाद दो अलग-अलग कानूनी प्रश्न हैं।



