ओंकारेश्वर से रावरखेड़ी तक: पहला चरण, पहली अनुभूति ✍️ कपिल पांडे की सायकल परिक्रमा यात्रा से
“यह यात्रा सिर्फ पैरों से नहीं होती, यह तो आत्मा से चलनी पड़ती है।” — गजानन आश्रम, ओंकारेश्वर
नर्मदा परिक्रमा की हमारी पवित्र यात्रा का प्रारंभ हुआ ओंकारेश्वर के गजानन आश्रम से। वहाँ हमने केवल दो दिन बिताए, लेकिन आत्मिक तैयारी का जो अनुभव वहाँ मिला, उसने हमें पूरी परिक्रमा के लिए मानसिक रूप से दृढ़ कर दिया। सबसे पहले परिक्रमा का पंजीकरण कराया — एक दस्तावेज नहीं, बल्कि माँ नर्मदा के दरबार में हमारी उपस्थिति का आधिकारिक प्रतीक। 🌅 17 नवम्बर की भोर – संकल्प की बेला भोर की अर्ध्य रश्मियों के साथ हमने ब्रह्ममुहूर्त में स्नान किया और भगवान ओंकारेश्वर तथा ममलेश्वर के दर्शन कर गौ घाट पहुँचे। वहीं पं. अनिल शर्मा जी ने विधिपूर्वक हमारा संकल्प कराया — "अब आप स्वयं नर्मदा माँ का स्वरूप हो, अब हर कर्म तप बन जायेगा।" उनके निर्देश पर हमने मुंडन करवाया, नर्मदा में स्नान किया और कन्याओं को भोजन कराकर माँ को प्रणाम किया। यात्रा प्रारंभ – भिक्षा, भक्ति और भक्ति में भूख सुबह 8 बजे हमने चाय-नाश्ता कर अपनी साइकिल यात्रा प्रारंभ की। भिक्षा का नियम अब जीवन का हिस्सा बन चुका था — न मांगना, न खरीदना। दोपहर 2 बजे भूख सताने लगी। कोई दुकान नहीं, कोई साधन नहीं। तभी हमारी साइकिल एक शादी समारोह के मंडप के सामने जाकर रुक गई — माँ का संकेत था शायद! एक सज्जन ने भोजन के लिए आग्रह किया — और वह भोजन, वो प्रेम, आत्मा तक तृप्त कर गया। उस दिन जाना, "नर्मदे हर" का अर्थ केवल मंत्र नहीं, बल्कि माँ की करुणा का जीवंत रूप है।
टोक्सर – जहाँ थकान भी साधना बन जाती है
आगे बढ़ते हुए हम पहुंचे टोक्सर — एक अध्यात्मिक पड़ाव, जहाँ गौमुख बाबड़ी से शिव का निरंतर अभिषेक होता है।
यहाँ के त्रिपुरसुंदरी मंदिर, आश्रमों की शांति, कीर्तन और नर्मदा की कलकल धारा — सब कुछ हमें भीतर से स्पर्श कर गया।
नर्मदा तट पर बैठकर अचमन किया, मानो शरीर की थकान और आत्मा की उलझन — दोनों धुल गए।