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कागज़़ी उपलब्धियों और ज़मीनी हकीकत के बीच पसरा है प्यासा भारत

कागज़़ी उपलब्धियों और ज़मीनी हकीकत के बीच पसरा है प्यासा भारत
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राजकुमार सिन्हा पर्यावरण एवं सामाजिक कार्यकत्र्ता भोपाल/नई दिल्ली बरगी बाँध विस्थापित एवं प्रभावित संघ के राजकुमार सिन्हा के अनुसार ग्रामीण भारत को 'हर घर नल से जलÓ उपलब्ध कराने की महत्वाकांक्षी योजना जल जीवन मिशन को पाँच वर्ष से अधिक समय हो चुका है, लेकिन अब भी लाखों घरों में प्यास का स्थायी समाधान नहीं हो पाया है। हाल ही में लोकसभा में पेश संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट ने कई राज्यों की विफलता को उजागर किया है, जिनमें राजस्थान, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल, झारखंड और केरल जैसे बड़े राज्य प्रमुख हैं।

11 राज्य पहुंचे लक्ष्य पर, एमपी 30वें स्थान पर

रिपोर्ट में उल्लेख है कि देश के 11 राज्यों में 100त्न ग्रामीणों को नल से जल उपलब्ध कराया जा चुका है, जबकि मध्यप्रदेश जल जीवन मिशन की रैंकिंग में 34 राज्यों में 30वें स्थान पर है। राज्य में अब तक 75.29 लाख परिवारों को कनेक्शन मिला, लेकिन 36.60 लाख परिवार अब भी वंचित हैं। बड़ी चिंता की बात यह है कि जहां कनेक्शन हुए हैं, वहाँ पानी की निरंतरता, गुणवत्ता और विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिन्ह हैं।

"कनेक्शन मिला, पर पानी नहीं" — जमीनी सच्चाई

जल जीवन मिशन में सड़क खोदकर पाइप डाल देना या टंकी बनाकर अधूरी छोड़ देना, कई जिलों की आम समस्या बन गई है। सर्वे के अनुसार: 1271 गांवों में से 217 गांवों में नल नहीं लगे, फिर भी मिशन पोर्टल पर "पूरा" दर्शा दिया गया। केवल 209 गांवों में ही सभी मानक पूरे पाए गए। थर्ड पार्टी सैंपलिंग में बैक्टीरिया और रासायनिक मिलावट सामने आई, जो मिशन की गुणवत्ता पर सवाल उठाती है। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, 65 गांवों में से 47 में पानी नहीं पहुंचा, कहीं पाइप अधूरे हैं तो कहीं टंकी ही नहीं बनी। [caption id="attachment_32106" align="alignright" width="300"] कागज़़ी उपलब्धियों और ज़मीनी हकीकत के बीच पसरा है प्यासा भारत[/caption]

जबलपुर-मंडला: बड़े प्रोजेक्ट, धीमी रफ्तार

जबलपुर जिले के 1680 गांवों में बरगी बांध और नर्मदा नदी से जल आपूर्ति का 2000 करोड़ रुपए का प्रोजेक्ट 2020-21 में शुरू हुआ। लेकिन 2024 तक भी लोग कुएं और बोरिंग पर निर्भर हैं। मंडला जिले में 2022 में घोषित योजनाएँ — बिछिया क्षेत्र में 613 करोड़ और नारायणगंज-बीजाडांडी में 180 करोड़ की जल योजनाएं — अब तक अधूरी हैं। 134 टंकियों में से एक भी पूरी नहीं हुई। स्थानीय जनता भ्रष्टाचार और बजट की अनियमितता को इसका कारण मानती है।

बजट का भारी अंतर और उपयोगिता पर प्रश्न

जल जीवन मिशन के लिए अब तक 3.6 लाख करोड़ खर्च हुए। 2025-26 बजट में 67000 करोड़, जबकि 2024-25 में संशोधित खर्च मात्र 29916 करोड़ रहा। मध्यप्रदेश को 26952 करोड़ का आवंटन, जिसमें 18674 करोड़ ही व्यय किए गए। प्रदेश बजट में 17136 करोड़ का नया प्रावधान है, लेकिन भविष्य की पारदर्शिता अनिश्चित है।

सामाजिक असर: महिलाओं की बचत, लेकिन अभी सपना अधूरा

विश्व स्वास्थ्य संगठन का आकलन है कि यदि जल जीवन मिशन पूरी तरह सफल हो गया, तो रोज़ाना 5.5 करोड़ घंटे की बचत होगी, जो मुख्यत: महिलाओं द्वारा पानी लाने में खर्च होती है। लेकिन हकीकत यह है कि कई जगहों पर महिलाएँ अब भी खाली बर्तन लेकर प्रदर्शन कर रही हैं।

निष्कषर्: निगरानी, पारदर्शिता और राजनीतिक इच्छाशक्ति की दरकार

जल जीवन मिशन अपने मूल उद्देश्य में तब तक सफल नहीं हो सकता, जब तक राज्य सरकारें और स्थानीय एजेंसियाँ ज़मीनी स्तर पर जवाबदेह और पारदर्शी नहीं बनतीं। केवल आंकड़ों और पोर्टल पर योजनाएँ पूरी दिखा देना काफी नहीं। ग्रामीण भारत की प्यास बुझाने के लिए तकनीकी गुणवत्ता, ईमानदार क्रियान्वयन, और समन्वित प्रयासों की सख्त जरूरत है।

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