ब्रह्मलीन पूज्य शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी की जन्म स्थली में विवाद पवित्र आत्मा के लिये कष्टकारी
संपूर्ण भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म दृढता के साथ इस बात को स्वीकार करता है कि संत विश्व कल्याण के लिये बिना किसी भेद भाव के काम करते है । संपूर्ण समाज को धर्म के माध्यम से अनुशासित करते है और यह क्रम युग युगांतर से चल रही है और यह रूकने वाली परंपरा भी नहीं है यह युगो तक आगे भी चलते रहेगी, इसके साथ ही संपूर्ण सनातन समाज आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित शंकराचार्य परंपरा पर विश्वास करता है और अटूट आस्था रखता है ।
स्वामी प्रज्ञानानंद जी महाराज को काशी विद्वत परिषद ने द्विपीठाधीश्वर शंकराचार्य घोषित किया है और कथित वसीयत के आधार पर द्वारका शारदा पीठ के घोषित शंकराचार्य स्वामी सदानंद जी एवं ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी महाराज की नियुक्ति को अवैधानिक तथा शंकराचार्य बनाने की प्रक्रिया को चुनौती दी है । यह विषय पूरी तरह धर्माचार्यो एवं कानूनविदों का है और यह विवाद कुछ समय पूर्व उपजा है परंतु जिले में मतभेदों (अनिर्णित) के साथ घोषित तीनों शंकराचार्यो की शिष्य और श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या है और लंबे समय से जिले में उनके धार्मिक प्रवासों पर भक्तिपूर्वक श्रद्धालु बड़ी संख्या में उपस्थित होते रहे है और तीनों महाराजश्री ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी महाराज के कृपापात्र शिष्य है । तीनों के प्रति अटूट आस्था और श्रद्धा को विभाजित करना मुश्किल है ।
श्रद्धालुओं में दुविधा
शंकराचार्य पद को लेकर उपजा विवाद आम श्रद्धालुओं के लिये दुविधा का कारण बन रहा है और विवाद बढऩा वह अच्छा भी नहीं मान रहे है । श्रद्धावानों का कहना है कि तीनों महाराजश्री आस्था के केन्द्र है उनके बीच जो भी मतभेद है उनका निराकरण अधिकार संपन्न धर्माचार्य और अदालत कर सकती है इसमें आमजनता कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकती और इसकी सामर्थ भी नहीं है परंतु इस प्रकार के विवाद से ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी की प्रतिष्ठा पर विपरीत प्रभाव और उनकी आत्मा को दुख होगा । सिवनी उनकी जन्म स्थली है ऐसे पवित्र क्षेत्र में इस प्रकार के विवाद खडे होना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है ।