सिवनी जिला पंचायत अविश्वास प्रस्ताव में कांग्रेस का गणित फेल, 16 सदस्यों के समर्थन की उम्मीद के बीच पक्ष में पड़े सिर्फ 12 मत; सेंधमारी में एक ठेकेदार की भूमिका और बड़े आर्थिक लेन-देन की चर्चाओं ने बढ़ाई सियासी हलचल
सिवनी यशो :- जिला पंचायत अध्यक्ष श्रीमती मालती मुकेश डहेरिया के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाकर सत्ता परिवर्तन की तैयारी में जुटी कांग्रेस को ऐसा झटका लगा कि अब पूरी रणनीति पर ही सवाल खड़े हो गए हैं। सदस्यों को एकजुट रखने के लिए निगरानी, संपर्क और सुरक्षा के तमाम इंतजाम किए जाने की चर्चा थी, लेकिन 22 अक्टूबर को मतदान का परिणाम आया तो कांग्रेस और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के दावों की हवा निकल गई। 16 सदस्यों के समर्थन की उम्मीद के बावजूद अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में केवल 12 मत पड़े, जबकि विरोध में 7 मत आए। अध्यक्ष की कुर्सी बच गई और कांग्रेस के खेमे में हार के कारणों की तलाश शुरू हो गई।
सियासी गलियारों में इस घटनाक्रम पर चुटकी ली जा रही है कि कांग्रेस ने सदस्यों को संभालने के लिए जितनी कड़ी पहरेदारी की, भाजपा फिर भी उसकी आंखों से काजल चुरा ले गई। अब सवाल यह है कि जब संख्या बल अपने पक्ष में होने का भरोसा था, तो मतदान के दिन चार मतों का अंतर कैसे पैदा हो गया? क्या रणनीति बनाने वालों से चूक हुई या पर्दे के पीछे कोई ऐसा खेल चला, जिसका अंदाजा कांग्रेस को आखिरी समय तक नहीं लग पाया?
16 सदस्यों का दावा, 12 मतों पर सिमटी उम्मीद
19 सदस्यीय सिवनी जिला पंचायत में उपलब्ध जानकारी के अनुसार भाजपा के तीन, कांग्रेस के 11 और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के पांच सदस्य हैं। कांग्रेस और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के कुल 16 सदस्यों के आंकड़े के आधार पर अविश्वास प्रस्ताव को लेकर विपक्षी खेमे में मजबूत उम्मीदें थीं। प्रस्ताव की प्रक्रिया आगे बढ़ाने से लेकर मतदान की तारीख तय होने तक कांग्रेस संगठन सक्रिय रहा। जिला प्रभारी एवं परासिया विधायक सोहनलाल बाल्मीक और जिला कांग्रेस अध्यक्ष नरेश मरावी सहित संगठन के नेता सदस्यों के संपर्क में थे।
लेकिन मतदान के नतीजों ने पूरा गणित उलट दिया। प्रस्ताव के पक्ष में 12 और विरोध में 7 मत पड़े। इस परिणाम ने कांग्रेस की रणनीति, सदस्यों के बीच तालमेल और विपक्षी एकजुटता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों के लिए भी यह घटनाक्रम दिलचस्प है। जब समर्थन का आंकड़ा 16 बताया जा रहा था, तो प्रस्ताव के पक्ष में केवल 12 मत कैसे आए? क्या विपक्षी खेमे में पहले से दरार थी या मतदान के दौरान समीकरण बदल गए? इन सवालों के जवाब अभी स्पष्ट नहीं हैं।
सेंधमारी की चर्चा में ठेकेदार का नाम, आधा करोड़ रुपये खर्च होने के दावे की भी चर्चा
अविश्वास प्रस्ताव गिरने के बाद राजनीतिक चर्चाओं में एक कथित ठेकेदार की भूमिका का मुद्दा भी सामने आया है। स्थानीय राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि कांग्रेस के करीबी माने जाने वाले एक ठेकेदार ने सदस्यों को प्रभावित करने और विपक्षी खेमे की रणनीति को कमजोर करने में भूमिका निभाई। इस संबंध में आधा करोड़ रुपये से अधिक की राशि खर्च किए जाने का दावा भी चर्चा में है।
हालांकि, इन चर्चाओं और कथित आर्थिक लेन-देन की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। किसी व्यक्ति द्वारा धन खर्च किए जाने या सदस्यों को प्रभावित करने के आरोप को प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता, जब तक उसके समर्थन में विश्वसनीय साक्ष्य सामने न आएं।
इसके बावजूद यह सवाल राजनीतिक बहस के केंद्र में है कि यदि सदस्यों की संख्या और समर्थन को लेकर कांग्रेस आश्वस्त थी, तो परिणाम उसके विपरीत क्यों आया? क्या पर्दे के पीछे कोई प्रभावी राजनीतिक रणनीति चली या कांग्रेस अपने ही खेमे को एकजुट रखने में नाकाम रही? फिलहाल इन सवालों पर अटकलें हैं, ठोस निष्कर्ष नहीं।
प्रभारी ने जिम्मेदारी ली, पद से मुक्त करने के लिए पटवारी को लिखा पत्र
अविश्वास प्रस्ताव की विफलता के बाद सिवनी जिला कांग्रेस संगठन के प्रभारी एवं परासिया विधायक सोहनलाल बाल्मीक ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी को पत्र लिखकर प्रभारी पद से मुक्त करने का अनुरोध किया है। 22 अक्टूबर 2026 को लिखे गए पत्र में बाल्मीक ने अविश्वास प्रस्ताव में अपेक्षित सफलता नहीं मिलने की जिम्मेदारी स्वयं लेते हुए क्षमा मांगी है।
उन्होंने पत्र में कहा कि परासिया विधानसभा क्षेत्र में कार्यों की व्यस्तता अधिक होने के कारण वे सिवनी जिले को पर्याप्त समय नहीं दे पा रहे हैं। इन परिस्थितियों को देखते हुए उन्होंने सिवनी जिला प्रभारी के पद से मुक्त करने का आग्रह किया। साथ ही भविष्य में पार्टी की ओर से दी जाने वाली जिम्मेदारियों का निर्वहन करने के लिए तत्पर रहने की बात भी कही।
पत्र की प्रतिलिपि मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रभारी हरीश चौधरी और सिवनी जिला कांग्रेस अध्यक्ष नरेश मरावी को भी भेजी गई है।
बाल्मीक का यह पत्र ऐसे समय सामने आया है, जब जिला पंचायत में अविश्वास प्रस्ताव गिरने के बाद कांग्रेस संगठन की रणनीति पर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, पत्र में उन्होंने पद से मुक्त करने का कारण परासिया में व्यस्तता बताया है और प्रस्ताव की विफलता की जिम्मेदारी भी स्वयं ली है। इसे सीधे तौर पर संगठन के भीतर किसी विवाद का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
अब हार का ठीकरा किसके सिर फूटेगा?
अविश्वास प्रस्ताव की विफलता ने कांग्रेस के सामने दोहरी चुनौती खड़ी कर दी है। पहली, यह पता लगाना कि अपेक्षित समर्थन के बावजूद प्रस्ताव क्यों गिरा। दूसरी, जिला संगठन में रणनीतिक जिम्मेदारी और जवाबदेही को लेकर उठ रहे सवालों का समाधान करना।
यदि कांग्रेस को अपने सदस्यों की संख्या पर पूरा भरोसा था, तो मतदान के नतीजों ने उस भरोसे की बुनियाद पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया है। अब राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी है कि इस विफलता की जिम्मेदारी केवल जिला प्रभारी की होगी या रणनीति बनाने और उसे जमीन पर लागू करने वाले पूरे संगठन को जवाब देना पड़ेगा।
भाजपा के लिए यह परिणाम राजनीतिक राहत लेकर आया है, जबकि कांग्रेस के सामने अपनी रणनीति की समीक्षा करने की नौबत है। ठेकेदार की कथित भूमिका और आर्थिक लेन-देन को लेकर चल रही चर्चाओं की पुष्टि होना बाकी है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि जिला पंचायत का यह घटनाक्रम अब केवल अविश्वास प्रस्ताव की हार तक सीमित नहीं रहा।
सियासी तंज यही है—कांग्रेस ने संख्या गिनी, सुरक्षा की रणनीति बनाई और जीत का भरोसा पाला; लेकिन नतीजा आया तो कुर्सी बचाने में भाजपा सफल रही और कांग्रेस में अब जिम्मेदारी तय करने की बहस शुरू हो गई।