
लोकसेवी को दूसरों से सम्पर्क करते समय उन्हें सत्प्रेरणाएं प्रदान करते समय निन्दा, आलोचना से हमेशा बचना चाहिए। हो सकता है, वह आलोचना सुधार की भावना से की गई हो, पर सुनने वाले पर उसकी उलटी प्रतिक्रिया होती है। वह इसे अपना अपमान समझ लेता है और बैर बाँध लेता है।
इसलिए निन्दा आलोचना तो की ही न जाए, सुधार के उद्देश्य से त्रुटियाँ भी अकेले एकान्त में जहाँ लोकसेवी और वह व्यक्ति ही हो, ऐसे स्थान पर ही बतायी जायें।
निन्दा-आलोचना से बचते हुए समीक्षा और सुझाव एकान्त में दिये जाएँ, पर प्रशंसा-सराहना करने का कोई भी अवसर हाथ से न जाने दिया जाए। सेवा कार्यों में जो भी व्यक्ति कोई सहयोग देने के लिए आते हैं, उनमें अच्छे तत्त्वों की, परमार्थ निष्ठा की मात्रा रहती ही है। प्रशंसा करने पर व्यक्ति के कार्यों और उसकी निष्ठा को सराहा जाने पर, उसे उन अच्छे तत्त्वों के विकास की प्रेरणा मिलती है।
प्रशंसा सबके सामने की जाए, पर उस प्रशंसा के साथ यह सतर्कता रखी जाय कि किन्हीं प्रशंसित व्यक्ति में मिथ्याभिमान न आने लगे।अनावश्यक प्रशंसा से व्यक्ति में मिथ्याभिमान भी उत्पन्न होता है और वह प्रशंसा चापलूसी के स्तर की बन जाती है। प्रशंसा और चापलूसी में वही अंतर है, जो अमृत और विष में। प्रशंसा से व्यक्ति को प्रोत्साहन मिलता है और वह अपना उत्कर्ष करने की ओर बढ़ने लगता है, जबकि चापलूसी व्यक्ति में मिथ्याभिमान जगा देती है, जो उसे पतन के गर्त में धकेल देती है और दिग्भ्रमित करती है।
प्रशंसा और चापलूसी की एक कसौटी है। जब किसी व्यक्ति के गुणों को सराहा जाता है, उसके कार्यों के साथ ही उसकी निष्ठा भावना को भी सम्बोधित किया जाता है, तो वह प्रशंसा होती है। उससे साधारण से साधारण व्यक्ति भी यह अनुभव करने लगता है कि हमें इन गुणों के कारण प्रशंसा मिल रही है, अतः इन गुणों का विकास करना चाहिए। चापलूस व्यक्ति के स्वर में प्रायः दीनता का भाव रहता है तथा वह जिसकी प्रशंसा की जा रही है, उसकी तुलना उसी स्तर के व्यक्ति से भी करता है और तृतीय पुरुष को हर दृष्टि से घटिया सिद्ध करने की चेष्टा करता है, जैसे कोई विद्यार्थी अमुक अध्यापक की चापलूसी करता है तो वह अमुक अध्यापक की सारी विशेषताओं को अतिरंजित रूप में तो चित्रित करेगा ही, उसके दोषों को भी नितांत स्वाभाविक बतायेगा साथ ही किसी तीसरे अध्यापक से उसकी तुलना करते हुए उसे सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने की कोशिश करेगा।
प्रशंसा से प्रोत्साहन तो मिले, पर उसके कारण अहंकार न जागे। इसलिए प्रशंसित व्यक्ति की न किसी से तुलना की जाए और न ही उसके दोषों को गुणों के रूप में बखाना जाए। इस तरह की प्रशंसा व्यक्ति को अभीष्ट दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।




