जंगल बचाने के नाम पर गांव खाली, लेकिन रिसॉर्ट और होटल लगातार बढ़ रहे!
पेंच क्षेत्र में संरक्षण मॉडल पर उठ रहे गंभीर सवाल, पारदर्शिता के अभाव पर भी चर्चा तेज

सिवनी यशो:- पेंच राष्ट्रीय उद्यान और उससे लगे वन क्षेत्रों में वन्यजीव संरक्षण के नाम पर वर्षों से गांवों के विस्थापन और करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के बावजूद लगातार बढ़ता मानव-वन्यजीव संघर्ष अब संरक्षण व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है। एक ओर पारंपरिक ग्रामीणों को जंगल से बाहर किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर पर्यटन सुविधाओं और व्यवसायिक गतिविधियों के नाम पर जंगलों के आसपास होटल, रिसॉर्ट और व्यावसायिक निर्माण तेजी से बढ़ते जा रहे हैं।
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा तेज है कि आखिर वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए यदि गांवों को हटाना जरूरी माना गया, तो फिर व्यावसायिक पर्यटन गतिविधियों को लगातार विस्तार देने की अनुमति कैसे दी जा रही है?
विभागीय गोपनीयता पर भी सवाल
वन विभाग और संबंधित एजेंसियों की कार्यप्रणाली को लेकर यह आरोप भी लगातार सामने आते रहे हैं कि विभागीय उच्चाधिकारियों के भ्रमण और निरीक्षण तक की सूचनाएं अत्यधिक गोपनीय रखी जाती हैं। स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि संरक्षण से जुड़े कई महत्वपूर्ण निर्णयों और खर्च संबंधी जानकारियों में पारदर्शिता का अभाव दिखाई देता है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि विभागीय स्तर पर केवल उपलब्धियों और सकारात्मक आंकड़ों को सामने लाया जाता है, जबकि जमीनी समस्याओं, अव्यवस्थाओं और संरक्षण की वास्तविक चुनौतियों पर खुलकर चर्चा नहीं होती।
गांवों का विस्थापन, लेकिन बढ़ते जा रहे व्यवसायिक होटल
वन्यजीव संरक्षण के नाम पर कई पारंपरिक गांवों को जंगल क्षेत्रों से बाहर विस्थापित किया गया। इन परियोजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च होने की जानकारी दी जाती रही है। लेकिन दूसरी ओर जंगलों के आसपास तेजी से बढ़ते रिसॉर्ट, होटल और पर्यटन गतिविधियों ने नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि कई स्थानों पर पर्यटन
सुविधाओं के संचालन में स्थानीय समितियों और पर्यावरणीय मापदंडों का पूरी तरह पालन नहीं किया जा रहा। इससे जंगलों की शांति और वन्यजीवों के प्राकृतिक व्यवहार पर प्रभाव पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
“वन्यजीव संरक्षण या पर्यटन व्यवसाय?”
क्षेत्र में यह बहस भी तेज हो रही है कि क्या संरक्षण का मूल उद्देश्य अब धीरे-धीरे पर्यटन व्यवसाय के दबाव में कमजोर पड़ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि जिन क्षेत्रों में पहले प्राकृतिक शांति और पारंपरिक जीवनशैली थी, वहां अब देर रात तक गतिविधियां, वाहनों की आवाजाही और पर्यटकों की बढ़ती संख्या वन्यजीवों के लिए चुनौती बनती जा रही है।
शराबखोरी और अनैतिक गतिविधियों पर भी उठे सवाल
स्थानीय स्तर पर कुछ सामाजिक संगठनों और ग्रामीणों द्वारा यह आरोप भी लगाए जाते रहे हैं कि कुछ पर्यटन स्थलों और रिसॉर्ट्स में शराबखोरी, देर रात पार्टियां और अन्य अनैतिक गतिविधियां होती हैं, जिससे जंगल क्षेत्र की संवेदनशीलता प्रभावित होती है।
इसके अलावा पर्यटन स्थलों पर उपलब्ध भोजन की गुणवत्ता और खाद्य सुरक्षा को लेकर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। हालांकि इन मामलों में संबंधित विभागों की ओर से सार्वजनिक स्तर पर विस्तृत जानकारी कम ही सामने आती है।
मानव-वन्यजीव संघर्ष लगातार बढ़ रहा
ग्रामीण क्षेत्रों में लगातार बाघ, तेंदुआ, भालू और अन्य वन्यजीवों की आमद ने लोगों में भय का माहौल बना दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जंगलों के भीतर पानी, भोजन और शांत आवास की स्थिति कमजोर होती है, तो वन्यजीव सुरक्षित क्षेत्रों से बाहर निकलने लगते हैं।
ऐसे में सवाल यह भी उठ रहा है कि संरक्षण के नाम पर खर्च हो रही बड़ी राशि का वास्तविक लाभ आखिर जंगल और वन्यजीवों तक कितना पहुंच पा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल
यदि पारंपरिक गांवों को हटाना वन्यजीव संरक्षण के लिए जरूरी था, तो फिर बढ़ते व्यवसायिक होटल, रिसॉर्ट और पर्यटन गतिविधियां किस सीमा तक नियंत्रित हैं? क्या संरक्षण और पर्यटन के बीच संतुलन वास्तव में कायम है, या फिर जंगलों की शांति धीरे-धीरे व्यवसायिक दबाव में कमजोर होती जा रही है?



