पद से नहीं, जनसेवा से बनाई पहचान; अब उत्तराखंड के राज्यपाल बने डॉ. ढाल सिंह बिसेन
पांच दशक की राजनीति, चार बार विधायक, मंत्री और सांसद के रूप में निभाईं जिम्मेदारियां; आम लोगों से सीधा जुड़ाव बना लोकप्रियता की सबसे बड़ी ताकत
डॉ. ढाल सिंह बिसेन बने उत्तराखंड के राज्यपाल, जानिए राजनीतिक सफर
Seoni, 12 October 2026
सिवनी यशो:- राजनीति में पद और प्रतिष्ठा अनेक नेताओं को मिलती है, लेकिन आम आदमी के सुख-दुख से जुड़कर उसके विश्वास को कायम रखना हर किसी के लिए आसान नहीं होता। वरिष्ठ भाजपा नेता डॉ. ढाल सिंह बिसेन उन नेताओं में गिने जाते हैं, जिन्होंने लंबे राजनीतिक सफर के दौरान जनता से अपने सीधे संवाद और सहज व्यवहार को अपनी पहचान बनाए रखा। अब उन्हें उत्तराखंड का राज्यपाल नियुक्त किए जाने से उनके सार्वजनिक जीवन में एक नया अध्याय जुड़ गया है। राष्ट्रपति द्वारा छह राज्यों में राज्यपालों की नियुक्ति की गई है, जिनमें डॉ. बिसेन को उत्तराखंड की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
डॉ. बिसेन की यह नियुक्ति उनके लंबे राजनीतिक अनुभव, संगठनात्मक कार्यशैली और सार्वजनिक जीवन में निभाई गई विभिन्न जिम्मेदारियों के संदर्भ में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। मध्यप्रदेश की राजनीति में विधायक, मंत्री, वित्त आयोग के अध्यक्ष और सांसद के रूप में काम कर चुके डॉ. बिसेन ने अपने राजनीतिक जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन जनता से संपर्क बनाए रखने की उनकी शैली लगातार चर्चा में रही।
जनता का विश्वास ही उनकी असली पूंजी
डॉ. ढाल सिंह बिसेन की लोकप्रियता का एक प्रमुख आधार आम लोगों से उनका सीधा जुड़ाव रहा है। राजनीतिक पद पर रहने के दौरान ही नहीं, बल्कि पद से दूर रहने पर भी लोग अपनी समस्याओं और अपेक्षाओं को लेकर उनसे संपर्क करते रहे हैं। सहजता से लोगों की बात सुनना और समस्याओं के समाधान के लिए प्रयास करना उनके व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताओं में शामिल बताया जाता है।
राजनीति के लंबे सफर में उन्होंने संगठन और सरकार, दोनों स्तरों पर जिम्मेदारियां निभाईं। उनकी कार्यशैली में संगठन की मजबूती, क्षेत्रीय विकास और जनसमस्याओं के समाधान को महत्वपूर्ण स्थान मिला। यही कारण है कि उनकी नई संवैधानिक जिम्मेदारी को उनके समर्थक सार्वजनिक जीवन के अनुभव की एक नई भूमिका के रूप में देख रहे हैं।
पिपरिया से शुरू हुआ सफर, प्रदेश की राजनीति तक बनाई पहचान
14 मई 1952 को सिवनी जिले के पिपरिया गांव में जन्मे डॉ. ढाल सिंह बिसेन का राजनीतिक सफर जमीनी स्तर से शुरू हुआ। पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने भारतीय जनसंघ की विचारधारा से जुड़ते हुए राजनीति में कदम रखा। वर्ष 1976 में पंच के चुनाव से शुरू हुई उनकी चुनावी यात्रा आगे चलकर प्रदेश की राजनीति तक पहुंची।
वर्ष 1990 में वे बरघाट विधानसभा क्षेत्र से पहली बार विधायक निर्वाचित हुए। इसके बाद लगातार चार बार विधायक बनकर उन्होंने क्षेत्र में अपनी राजनीतिक पकड़ स्थापित की। मध्यप्रदेश शासन में मंत्री के रूप में उन्होंने वन, परिवहन, खनिज, स्कूल शिक्षा सहित विभिन्न विभागों की जिम्मेदारियां निभाईं। बाद में मध्यप्रदेश वित्त आयोग के अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया।
वर्ष 2019 में भाजपा ने उन्हें बालाघाट लोकसभा क्षेत्र से प्रत्याशी बनाया। चुनाव में दो लाख से अधिक मतों के अंतर से जीत दर्ज कर वे लोकसभा पहुंचे। विधायक से सांसद तक का उनका सफर प्रदेश और राष्ट्रीय राजनीति में उनके लंबे अनुभव का परिचायक रहा।
विकास कार्यों में भी छोड़ी अपनी छाप
डॉ. बिसेन के राजनीतिक जीवन में क्षेत्रीय विकास से जुड़े प्रयास भी महत्वपूर्ण रहे हैं। उनके समर्थकों और क्षेत्रीय राजनीतिक गतिविधियों से जुड़े विवरणों में सिवनी-बालाघाट क्षेत्र में सड़क, रेलवे और यात्री सुविधाओं के विस्तार के लिए किए गए प्रयासों का उल्लेख मिलता है।
सिवनी में पासपोर्ट कार्यालय की स्थापना के प्रयास, बरघाट क्षेत्र में केंद्रीय विद्यालय की स्वीकृति, एफएम रेडियो रिले केंद्र, सड़क परियोजनाओं और रेलवे अधोसंरचना से जुड़े कार्य उनके सार्वजनिक जीवन के उल्लेखनीय प्रसंगों में शामिल हैं। सांसद के रूप में उन्होंने क्षेत्र की बुनियादी सुविधाओं और आवागमन को बेहतर बनाने से जुड़े मुद्दों को भी उठाया।
वन मंत्री के रूप में तेंदूपत्ता नीति और शिक्षा मंत्री के रूप में बालिका शिक्षा को प्रोत्साहित करने वाली योजनाओं से जुड़े उनके कार्यकाल का भी उल्लेख किया जाता है। इन पहलों का विस्तृत मूल्यांकन संबंधित सरकारी अभिलेखों और परियोजनाओं की वर्तमान स्थिति के आधार पर किया जाना चाहिए, लेकिन उनके लंबे राजनीतिक सफर में विकास संबंधी मुद्दों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।
संगठन से संवैधानिक दायित्व तक
डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने मंडल अध्यक्ष और जिला अध्यक्ष जैसे संगठनात्मक दायित्वों से लेकर विधायक, मंत्री और सांसद तक विभिन्न भूमिकाओं में काम किया। उनका अनुभव केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संगठन संचालन, प्रशासनिक जिम्मेदारियों और क्षेत्रीय विकास से जुड़े विषयों तक फैला रहा है।
उत्तराखंड के राज्यपाल के रूप में अब उनकी भूमिका संवैधानिक दायित्वों के निर्वहन की होगी। राज्यपाल का पद राजनीतिक पदों से अलग प्रकृति का है, जहां संविधान के अनुरूप कार्य करना और राज्य की संवैधानिक व्यवस्था में निर्धारित भूमिका निभाना प्रमुख जिम्मेदारी होती है।
सिवनी के लिए गौरव का अवसर
सिवनी जिले के पिपरिया गांव से निकलकर प्रदेश और राष्ट्रीय राजनीति में पहचान बनाने वाले डॉ. बिसेन की राज्यपाल पद पर नियुक्ति को जिले के लिए गौरवपूर्ण अवसर के रूप में देखा जा रहा है। उनके राजनीतिक सफर में आम लोगों से जुड़ाव, संगठन के प्रति सक्रियता और विकास के मुद्दों पर काम करने की छवि प्रमुख रही है।
अब उत्तराखंड के राज्यपाल के रूप में उनके सामने एक नई जिम्मेदारी है। उनके समर्थकों और शुभचिंतकों को उम्मीद है कि पांच दशक से अधिक के सार्वजनिक जीवन का अनुभव इस संवैधानिक दायित्व के निर्वहन में उपयोगी साबित होगा। डॉ. बिसेन का यह सफर इस बात का उदाहरण है कि राजनीति में लंबे समय तक सक्रिय रहने के लिए केवल पद ही नहीं, बल्कि जनसंपर्क, व्यवहार और लोगों के विश्वास की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
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