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रेत चोरी की जांच में 10 दिन की देरी, कार्रवाई डंप तक सीमित क्यों?

उगली के नालों से कथित तौर पर गायब रेत का हिसाब कौन देगा? राजस्व नुकसान और अधिकारियों की जवाबदेही पर उठे सवाल

NGT का दरवाजा खटखटाने की तैयारी में शिकायतकर्ता, सभी नालों का भौतिक सत्यापन और कथित अवैध उत्खनन की मात्रा का आकलन कराने की मांग

यशोन्नति संवाददाता – नवाज खान

Seoni, 15 October 2026
सिवनी/केवलारी/उगली यशो:
 उगली क्षेत्र में कथित रेत चोरी की शिकायत के करीब 10 दिन बाद राजस्व एवं खनिज विभाग की संयुक्त टीम द्वारा जांच शुरू किए जाने के बाद कार्रवाई के दायरे को लेकर सवाल उठने लगे हैं। मौके पर रेत के डंप मिलने के बावजूद अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि नालों से कथित तौर पर निकाली गई रेत की वास्तविक मात्रा का पता कैसे लगाया जाएगा और शासन को हुए संभावित राजस्व नुकसान की गणना कौन करेगा?

शिकायतकर्ता एवं पर्यावरण संरक्षण से जुड़े स्वप्निल उपाध्याय ने जांच की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए मांग की है कि कार्रवाई केवल मौके पर मिले रेत के डंप तक सीमित न रहे। उगली क्षेत्र के सभी संबंधित नालों का भौतिक सत्यापन कराया जाए, कथित अवैध उत्खनन की मात्रा का आकलन हो और यह भी जांचा जाए कि इस पूरे मामले में किन व्यक्तियों तथा संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका रही है।

उगली क्षेत्र में कथित अवैध रेत उत्खनन की जांच और नालों के भौतिक सत्यापन की मांग
उगली क्षेत्र में कथित रेत चोरी की जांच का दायरा बढ़ाने और संभावित राजस्व नुकसान का आकलन कराने की मांग उठी।

उनका कहना है कि प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और शासन के राजस्व की सुरक्षा के लिए जरूरी है कि जांच में कथित उत्खनन से लेकर परिवहन, भंडारण और संभावित आर्थिक नुकसान तक पूरी कड़ी की पड़ताल की जाए।

डंप मिले, लेकिन जिम्मेदारी लेने कोई सामने नहीं आया?

शिकायतकर्ता के अनुसार, एसडीएम केवलारी के कथन के संबंध में उन्हें बताया गया कि जांच के दौरान रेत के डंप मिले हैं, लेकिन कोई व्यक्ति उनकी जिम्मेदारी स्वीकार करने के लिए सामने नहीं आया। ऐसे में सवाल उठता है कि इन डंपों में रखी रेत कहां से लाई गई, किसने उसका उत्खनन या परिवहन किया और उसका भंडारण किस उद्देश्य से किया गया?

किसी व्यक्ति द्वारा रेत के डंप का स्वामित्व स्वीकार नहीं करना जांच का अंत नहीं हो सकता। प्रशासन उपलब्ध साक्ष्यों, परिवहन संबंधी जानकारी, खनिज अभिलेखों, अनुमतियों और अन्य तथ्यों के आधार पर संबंधित व्यक्तियों की पहचान करने का प्रयास कर सकता है।

अब यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि जांच दल ने रेत के स्रोत का पता लगाने के लिए क्या कदम उठाए हैं और इस संबंध में कौन-से साक्ष्य जुटाए गए हैं।

नालों से निकली रेत की भरपाई कैसे होगी?

शिकायतकर्ता के अनुसार, एसडीएम केवलारी की ओर से यह बात भी कही गई कि नालों से पहले ही निकाली जा चुकी रेत की भरपाई केवल दोबारा रेत डालने से नहीं की जा सकती। यह विषय प्राकृतिक संसाधनों को संभावित नुकसान के आकलन की आवश्यकता को सामने लाता है।

यदि नालों से अवैध रूप से रेत निकाले जाने की पुष्टि होती है, तो केवल मौके पर उपलब्ध रेत की मात्रा दर्ज करना पर्याप्त होगा या नहीं—यह जांच का महत्वपूर्ण प्रश्न है। संबंधित स्थलों की वर्तमान स्थिति, उपलब्ध पुराने अभिलेखों, स्थल निरीक्षण और तकनीकी आकलन के आधार पर कथित उत्खनन की सीमा निर्धारित करना आवश्यक हो सकता है।

स्वप्निल उपाध्याय की मांग है कि सभी संबंधित नालों का भौतिक सत्यापन कराया जाए, ताकि यह पता चल सके कि कहां-कहां से रेत निकाले जाने की शिकायत है और प्राकृतिक संसाधनों को संभावित नुकसान कितना हुआ है।

खनिज विभाग की निगरानी व्यवस्था पर भी उठे सवाल

शिकायत और मीडिया रिपोर्टों के बाद जांच की प्रक्रिया आगे बढ़ने को लेकर खनिज विभाग की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठ रहे हैं। यदि क्षेत्र में लंबे समय से अवैध उत्खनन, परिवहन या भंडारण हो रहा था, तो उसकी रोकथाम के लिए नियमित निरीक्षण की क्या व्यवस्था थी? संबंधित क्षेत्र में खनिज निरीक्षक और खनिज अधिकारी ने पूर्व में कितने निरीक्षण किए तथा क्या कार्रवाई की?

इन सवालों का उत्तर विभागीय अभिलेखों, निरीक्षण प्रतिवेदनों और दर्ज प्रकरणों के आधार पर सामने आना चाहिए। साथ ही, यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि शिकायत मिलने से पहले संबंधित स्थलों की निगरानी किस प्रकार की जा रही थी।

हालांकि, शिकायत या मीडिया रिपोर्ट के बाद कार्रवाई होना अपने आप में किसी अधिकारी की मिलीभगत का प्रमाण नहीं है। फिर भी, यदि निगरानी में लापरवाही के तथ्य सामने आते हैं, तो संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच कर नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।

कितनी रेत निकली और शासन को कितना नुकसान हुआ?

इस मामले का सबसे अहम पहलू कथित रेत चोरी की वास्तविक मात्रा और शासन को हुए संभावित आर्थिक नुकसान का निर्धारण है। इसके लिए कुछ बुनियादी सवालों के जवाब सामने आना जरूरी हैं—

  • उगली क्षेत्र के किन-किन नालों से रेत निकाले जाने की शिकायत है?
  • कथित उत्खनन कितनी मात्रा में और कितने समय के दौरान हुआ?
  • संबंधित स्थलों पर वैध उत्खनन या परिवहन की अनुमति थी या नहीं?
  • मौके पर मिले डंप की मात्रा कितनी है और रेत का स्रोत क्या है?
  • लागू नियमों के अनुसार संभावित रॉयल्टी, जुर्माने अथवा अन्य देय राशि का निर्धारण कैसे होगा?
  • प्राकृतिक संसाधनों को संभावित नुकसान का आकलन किस तकनीकी प्रक्रिया से किया जाएगा?

इन प्रश्नों का उत्तर अनुमान के आधार पर नहीं, बल्कि स्थल निरीक्षण, माप-जोख, खनिज एवं राजस्व अभिलेखों, उपलब्ध अनुमतियों और अन्य साक्ष्यों के आधार पर दिया जाना चाहिए। इससे जांच की वास्तविक स्थिति और शासन को हुए संभावित नुकसान का अधिक स्पष्ट आकलन हो सकेगा।

जांच का दायरा नहीं बढ़ा तो NGT जाने की तैयारी

शिकायतकर्ता स्वप्निल उपाध्याय ने कहा है कि यदि जांच केवल वर्तमान में मिले रेत के डंप तक सीमित रहती है और सभी संबंधित नालों का भौतिक सत्यापन, कथित अवैध उत्खनन की मात्रा का आकलन तथा जिम्मेदार लोगों की भूमिका की पड़ताल नहीं होती, तो वे पर्यावरण संरक्षण के मुद्दे पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के समक्ष उचित आवेदन प्रस्तुत करने की तैयारी करेंगे।

 

उनकी प्रमुख मांगों में सभी संबंधित नालों का स्थल निरीक्षण, उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर पूर्व और वर्तमान स्थिति का तुलनात्मक आकलन, कथित उत्खनन की मात्रा का निर्धारण, शासन को हुए संभावित नुकसान की गणना तथा संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच शामिल है।

उन्होंने यह भी मांग की है कि आवश्यक स्थलों का निरीक्षण पारदर्शी तरीके से किया जाए और पंचनामा सहित संबंधित दस्तावेजों में वास्तविक स्थिति दर्ज की जाए। इससे जांच के निष्कर्षों को साक्ष्यों के आधार पर परखा जा सकेगा।

अब प्रशासन की जवाबदेही की परीक्षा

रेत के डंप पर कार्रवाई करना जरूरी कदम हो सकता है, लेकिन इससे नालों से कथित तौर पर निकाली गई रेत, प्राकृतिक संसाधनों को संभावित नुकसान और शासन के राजस्व से जुड़े सभी सवालों का जवाब अपने आप नहीं मिल जाता।

अब प्रशासन के सामने चुनौती है कि वह जांच का दायरा स्पष्ट करे, उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर वास्तविक स्थिति सामने लाए और जहां भी नियमों का उल्लंघन या लापरवाही प्रमाणित हो, वहां नियमानुसार कार्रवाई सुनिश्चित करे।

सवाल अब सिर्फ रेत के डंप का नहीं, बल्कि पूरी जांच का है—क्या कार्रवाई मौके पर मिली रेत तक सीमित रहेगी या उगली के नालों से लेकर खनिज अभिलेखों और संभावित राजस्व नुकसान तक हर कड़ी की पड़ताल होगी? क्षेत्र के लोगों की नजर अब जांच के निष्कर्षों और प्रशासन की अगली कार्रवाई पर रहेगी।

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https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2043157&reg=48&lang=2

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