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ब्रह्माकुमारी संस्थान में मनाया गया शिक्षक दिवस

आदर्श शिक्षक वह है जो अपने आचरण से शिक्षा दे

     सिवनी यशो:-वर्तमान परिदृश्य में शिक्षकों के समक्ष चुनौतियां एवं शिक्षकों की भूमिका विषय पर बहुत ही गहराई से चिंतन किया गया ,कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉक्टर के के चतुर्वेदी जी ने अपने वक्तव्य में कहा ,कि वर्तमान समय सबसे बड़ी चुनौती है, पाठ्यक्रम का बार-बार परिवर्तन होना इसकी वजह से शिक्षकों को पढ़ाने में अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है ,और साथ-साथ शिक्षक एवं बच्चों में नशे की लत बढ़ती जा रही है, यह भी एक बहुत बड़ी चुनौती है, आज बच्चे खान-पान में ध्यान नहीं दे पा रहे हैं ,और इसकी वजह से पढ़ाई पर प्रभाव पड़ रहा है ,शिक्षक और विद्यार्थी के जीवन में आने वाली अनेक चुनौतियों के बारे मैं बात करने के बाद ,डॉक्टर चतुर्वेदी जी ने कहा ,कि अब शिक्षक और विद्यार्थी को आंतरिक रूप से सशक्त होना होगा इसके लिए आध्यात्मिकता को हमें हर हाल में अपनाना होगा ,जब हम आंतरिक रूप से सशक्त हो जाएंगे तो बाहर से आने वाली चुनौतियों का सामना सहज कर पाएंगे ,और इसके लिए मेडिटेशन करना बहुत-बहुत जरूरी है ,उन्होंने अपने कॉलेज एवं स्कूल में मेडिटेशन का कोर्स करने के लिए ब्रह्मकुमारी बहनों को निमंत्रण दिया, कार्यक्रम की आयोजिका ब्रह्माकुमारी ज्योति दीदी ने अपने वक्तव्य में कहा कि आज शिक्षक एवं विद्यार्थी चुनौती पूर्ण दूर से गुजर रहे हैं ऐसे समय में स्वाध्याय की आवश्यकता है , यानी स्वयं का अध्ययन -में कौन हू? मेरे अंदर कौन-कौन सी शक्तियां और गुण समाहित है? इन सभी बातों को जानना बेहद जरूरी है, हम सभी आत्माएं सर्वशक्तिमान परमात्मा की संतान है, हमारे अंदर अनंत शक्तियां हैं, लेकिन आज हम इन सबको भूल हुई हैं ,तो आवश्यकता है, स्वयं को पहचान और जानने की इसी बात को आगे बढ़ते हुए ब्रह्माकुमारी गीता दीदी ने कहा की राष्ट्र के निर्माण में शिक्षक की अहम भूमिका है, आदर्श शिक्षक वह है ,जो अपने आचरण से शिक्षा दे उन्होंने कहा डॉक्टर राधाकृष्णन हमेशा कहते थे विद्यालयों का मुख्य काम डिग्री वह डिप्लोमा बांटना नहीं है ,बल्कि छात्रों में एडवांस्ड लर्निंग की भावना पैदा करना है, छात्रों को जीवन में आने वाली चुनौतियों के लिए तैयार करना है ,उन्होंने कहा कि अब्दुल कलाम जी हमेशा कहा करते थे, *विज्ञान अध्यात्म के बिना अंधा है ,और अध्यात्म विज्ञान के बिना लंगड़ा है* दीदी ने आइंस्टीन का उदाहरण देते हुए बताया की आइंस्टीन ने अंतिम समय पर कहा – न जाने मैंने कितने वैज्ञानिक तथ्यों की खोज की पर मैं उसे तत्व को नहीं खोज पाया जो इन सब वैज्ञानिक तथ्यों का खोज करता था उसआविष्कारक को ही नहीं खोज पाया और आज मैं जीवन के इस अंतिम पड़ाव पर खाली ही जा रहा हूं ,अगले जन्म में मैं आत्मदर्शी आत्मनिर्वेशक संत बनू यह मेरी इच्छा है , मुझे अंतिम समय में इस बात पर खेद है और रहेगा की वैज्ञानिक होते हुए भी मैं क्या-क्या खोजने में लग रहा लेकिन स्वयं की खोज की तरफ मेरा ध्यान क्यों नहीं गया अत: दीदी ने कहा भौतिक जगत के ज्ञान के साथ-साथ हम अपने आंतरिक जगत को भी खोजने का प्रयास करें, आंतरिक अन्वेषक जरूर बने।

Dainikyashonnati

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