शीशे की अदालत में पत्थर की गवाही है, कातिल ही लुटेरा है, कातिल ही सिपाही है" — यह पंक्तियाँ आज सिवनी जिले की जमीनी हक़ीक़त बयाँ करती हैं। जब अपराध को सत्ता का संरक्षण मिले और व्यवस्था मौन धारण कर ले, तो जनजीवन की नींव हिल जाती है।
अपराधियों को राजनैतिक और प्रशासनिक छत्रछाया!
सिवनी यशो:- जब कातिल ही लुटेरा बन जाए और लुटेरा ही सिपाही, तब समाज का पतन कैसे रूकेगा यह चिंता का विषय है । सिवनी जिले में यही हो रहा है। नशे, सट्टा-जुआ और अन्य अनैतिक गतिविधियों में संलिप्त लोगों को राजनैतिक दलों का संरक्षण राजनैतिक दलों में तेजी पैठ गहरी हो रही है और उन्हें सरकारी तंत्र का संरक्षण भी प्राप्त है, जिसने पूरे प्रशासनिक तंत्र को या तो पंगु बना दिया है या दागदार। सत्ता और विपक्ष दोनों की भूमिका संदेह के घेरे में है। चाहे कोई भी दल हो, नेताओं का संरक्षण और अधिकारियों पर अनैतिक दबाव - दोनों ने मिलकर जिले की सामाजिक और नैतिक रीढ़ तोड़ डाली है। यह भी पढ़ें:- दो मासूमों की निर्मम हत्या: रिश्तेदार ने साइकिल दिलाने का बहाना कर जंगल में ले जाकर चाकू से रेत दिए गलेपुलिस चाहे तो बदल सकती है हालात
यहाँ स्पष्ट कर दें कि पुलिस प्रशासन और जिला प्रशासन जिस दिन यह ठान ले कि अनैतिक गतिविधियों में संलिप्त व्यक्तियों के विरूद्ध कार्यवाही करना है, उसी दिन अनैतिक कार्यो में संलिप्त सूरमाओं की चूले हिल जायेंगी और इस प्रकार की कार्यवाही पब्लिक ने देखी भी है, पब्लिक कोई पागल नहीं है जो यह समझती नहीं समझती कि कार्यवाही शिथिल क्यों चल रही है । हर अनैतिक गतिविधि के संचालित करने वालों के चि_े पुलिस के पास मौजूद होते है । पुलिस एक छोटे से सुराग से अपराधी के गले तक पहुँचने की योग्यता के लिये पहचानी जाती है। कहा भी जाता है कि कानून के हाथ बहुत लंबे होते है परंतु जिले में सूखने वाले नशे से लेकर सूखे नशा का कारोबार तेजी से बढ़ रहा है । छुट पुट व्यक्तियों को पकड़ा भी जाता है परंतु इस दिशा में कोई ऐसी बड़ी कार्यवाही न होना जिससे अंकुश लग सके नशे के कारोबार को बढ़ाने में मददगार साबित हो रहा है ।आत्महत्या और हत्या: आंकड़े नहीं, चेतावनी हैं!
बीते वर्षों में जिले में सैकड़ों जानें गईं हैं, जिनमें आत्महत्या और हत्या दोनों शामिल हैं। ये आंकड़े सिर्फ मृत्यु नहीं, एक बीमार हो चुके समाज का दस्तावेज हैं। युवा पीढ़ी नशे की गिरफ्त में आत्महत्या कर रही है, तो जुए और कर्ज में डूबे नागरिक हत्याएं करने या मरने को मजबूर हैं। जिन परिवारों ने इस प्रकार का दंश भोगा है उनके सपने और कानून व्यवस्था से भरोसा टूटा है ।प्रशासनिक मौन: कर्तव्य का पतन या सुविधा की शरण
यह गंभीर प्रश्न उठता है — यदि नेताओं के दबाव में ही कार्य करना था, तो उच्च शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाएँ, प्रशासनिक प्रशिक्षण सब किसलिए? क्या अपने सेवाकाल में सुविधाजनक नौकरी करना एक मात्र ध्येय है । उम्मीद की जाती है कि आईएएस, आईपीएस अधिकारी सहित अन्य उच्च सेवाओं में पदस्थ अधिकारी व्यवस्थाओं को सुचारू रूप से संचालित करने के लिये चुनौतियों का सामना करने की सक्षमता रखते है । उन पर समाज का एक भरोसा होता है परंतु यह व्यवस्था अब कमजोर होते जा रही है ।>>जिस पदवीधारी अधिकारी को जो अधिकार होते है उसका वह समाजहित में उपयोग न करें और उन अधिकारों का लोभ लालच दबाव में दुरूपयोग करें या उन अधिकारों को अपने निजी सुविधा का साधन मान ले तो लोकशांति की उम्मीद समाप्त हो जाती है । पद ने सही-गलत का निर्णय करने का अधिकार दिया, क्या आप उस अधिकार से पीछे हटकर उसे अपमानित नहीं कर रहे?