कहाँ चींटी, कहाँ पक्षियों में सबसे तेज उड़ने वाला पक्षी -गरुड़। यदि चींटी गरुड़ की तेज रफ्तार को सोच- सोच कर स्वयं अपनी धीमी गति से भी काम करना छोड़ दें, तो क्या वह कुछ कर सकती है? नहीं!
चींटी स्वयं अपने पक्के निश्चय से ही जो कुछ बन पड़ता है, उतनी ही मात्रा में अपना कार्य करती जाती है। दूसरों से निरूत्साहित नहीं होती, फिर अपने लक्ष्य पर भी पहुँच जाती है। उसी प्रकार मनुष्य को अपनी छोटी शक्तियों को देखकर निरूत्साहित नहीं होना चाहिए।
अपनी छोटी शक्ति से ही कार्य प्रारम्भ कर उसे पूर्ण करने का सतत् उद्योग करना चाहिए।
मनुष्य की समस्त मानसिक शक्तियाँ इन दो संकेतों के पीछे-पीछे चलती है:-
(1) मैं कर सकता हूँ (सफलता और विजय का मूल मंत्र)
(2) मैं नहीं कर सकूँगा (मझदार में डुबो देने वाला संकेत)
जब हम इन दोनों संकेतों में से किसी एक का उच्चारण करते हैं अथवा हमारा गुप्त मन इनमें से किसी को दृढ़ता से स्वीकार कर लेता है, तो हमारी मानसिक और शारीरिक शक्तियाँ भी इसी के इर्द-गिर्द इकट्ठे होने लगती है।
वह हमें वैसा ही उत्तर या सहयोग देती है।
पहला संकेत- “मैं कर सकता हूँ” मनुष्य के आत्मविश्वास को पुष्ट करता है, शक्तियों को जगाता है, उसे अपनी सिद्धि और सफलता पर विश्वास हो जाता है।
इस सृजनात्मक विचार का शक्तिवर्ध्दक प्रभाव हमारे शरीर के संगठन पर पड़ता है। इन निश्चित, दृढ़ और आशा भरे विचारों से हमारा मुख मण्डल दमकता हुआ मालूम पड़ता है और हमारे सम्पूर्ण कार्य सजीव मालूम पड़ते हैं।
दूसरे संकेत “मैं कुछ नहीं कर सकूँगा” से निराशा के विचार हमारे गुप्त मन में छा जाते हैं। मुख मलीन हो उठता है और शरीर तथा मस्तिष्क की शक्तियों का ह्रास होने लगता है।
इस तथ्य को प्रमाणित किया जा चुका है कि निराशा, अविश्वास, चिन्ता और शोक इत्यादि हमारी अवाँछनीय और दुर्बलता पैदा करने वाली मनःस्थितियाँ हैं।
अपने प्रति अविश्वास का एक विषैला शब्द या वाक्य मानसिक संस्थान में ही गड़बड़ ही नहीं मचाता बल्कि पूरे शरीर पर और विशेषतः हमारे हृदय पर दूषित प्रभाव डाल कर उसे कमजोर बना देता है।
अनेक कच्चे मन वाले व्यक्ति तो काल्पनिक बीमारियों से व्यर्थ ही परेशान रहा करते हैं। अपने प्रति कमजोर भावनाएँ रखकर रक्त के प्रवाह में रुकावट पैदा कर लेते हैं।
“मैं कमजोर हूँ”, “रोगी हूँ” ऐसा कहने से तन्तुजाल में भी गड़बड़ी पैदा हो जाती है और इनसे शरीर के समस्त कार्यों में आंशिक शिथिलता आ जाती है। जो यह मान लेता है, कि मुझमें अपने आदर्श तक पहुँचने की शक्ति और सामर्थ्य है, वह अन्त में एक दिन अपने इष्ट सिद्धि कर ही लेता है।
जो यह सोचता रहता है, कि “मैं यह कार्य कर सकूँगा या नहीं” वह संशय वृत्ति के कारण कुछ भी नहीं कर पाता।






