हाईकोर्ट का बड़ा वार: याचिका खारिज, 1 लाख जुर्माना… फेसबुक पोस्ट से मचा बवाल
तथ्य छिपे, कोर्ट भड़का: 1 लाख जुर्माना, कहा याचिका कर्ता मासूम नहीं
हाईकोर्ट जुर्माना याचिका खारिज “तथ्य छिपे, याचिका गिरी”
सिवनी/बालाघाट | विशेष रिपोर्ट
खनन के नाम पर जनहित की लड़ाई का दावा करने वाले बालाघाट के भोरगढ़ निवासी जितेंद्र उर्फ राजा लिल्हारे को
मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की जबलपुर खंडपीठ से बड़ा झटका लगा है।
न्यायमूर्ति विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने रिट याचिका
WP-2714/2026 को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता पर ₹1,00,000 (एक लाख रुपए) का जुर्माना लगाया है।
कोर्ट का स्पष्ट रुख—‘तथ्य छिपाना गंभीर’
सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से उपमहाधिवक्ता अभिजीत अवस्थी ने कोर्ट को बताया कि—
- याचिकाकर्ता पहले भी इसी मुद्दे पर WP-36057/2024 दायर कर चुका था
- उस याचिका को NGT जाने की स्वतंत्रता के साथ वापस लिया गया
- नई याचिका में इस तथ्य का कोई उल्लेख नहीं किया गया
कोर्ट ने इसे गंभीर मानते हुए कहा कि तथ्यों को छिपाकर याचिका दायर करना न्यायिक प्रक्रिया के साथ खिलवाड़ है।
‘मासूम ग्रामीण’ की दलील पर कोर्ट का जवाब
याचिकाकर्ता ने खुद को “साधारण किसान और प्रकृति प्रेमी” बताया, लेकिन कोर्ट ने साफ कहा—
जो व्यक्ति दो बार NGT, दो बार हाईकोर्ट और PMO तक शिकायतें कर चुका हो, उसे कानून की समझ नहीं है—यह मानना संभव नहीं।
संशोधन आवेदन भी खारिज
तथ्य सामने आने के बाद याचिकाकर्ता ने याचिका में संशोधन का आवेदन दिया, लेकिन कोर्ट ने इसे
“bona fide नहीं” मानते हुए खारिज कर दिया।
कोर्ट का कड़ा आदेश
- याचिका खारिज
- ₹1,00,000 का जुर्माना
- 4 सप्ताह में CCD खाते में जमा करने का निर्देश
- नहीं देने पर राजस्व वसूली (RRC)
- दोबारा ऐसा करने पर अवमानना कार्रवाई की चेतावनी
📱 फेसबुक पर लिल्हारे का बयान
“45 करोड़ 90 लाख रुपए का जुर्माना लगवा दिया रेत चोर रेत माफिया के ऊपर उस पर कोई चर्चा नहीं और सैकड़ो करोड रुपए का अभी तक जुर्माना करके नदियों को बचाने की लड़ाई लड़ी उस पर कोई चर्चा नहीं और दूसरी तरफ माननीय न्यायालय ने ₹100000 का जुर्माना लगा दिया तो उस पर चर्चा ही चर्चा इसे क्या कहेंगे आप स्वार्थ कहेंगे या रेत माफिया की भक्ति कहेंगे”
जमीनी हकीकत: खनन का कड़वा सच
यह भी उतना ही बड़ा सच है कि क्षेत्र में अवैध रेत खनन लगातार नदियों और नालों का स्वरूप बिगाड़ रहा है।
पर्यावरण पर इसका गंभीर असर पड़ रहा है। कई स्थानों पर माफिया के बीच गुंडागर्दी, टकराव और खूनी संघर्ष तक की घटनाएं सामने आ चुकी हैं।
स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा में है कि खनिज विभाग, राजस्व, पुलिस, राजनीतिक संरक्षण और ठेकेदारों का एक संगठित नेटवर्क
काम करता हुआ दिखाई देता है।
यह मुद्दा विधानसभा तक में उठ चुका है, लेकिन अब तक ठोस और स्थायी समाधान सामने नहीं आ पाया है।
अदालत का संदेश साफ है—जनहित के नाम पर याचिका, लेकिन तथ्य अधूरे या छिपे हों, तो कानून सख्ती से जवाब देता है।
साथ ही, खनन का असली मुद्दा आज भी उतना ही गंभीर है, जिस पर ठोस कार्रवाई की जरूरत बनी हुई है।







