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विकास के दावे धरे रह गए, कंधों पर अर्थी और पैरों में कीचड़!

Dainik Yashonnati

Dainik Yashonnati / Sep 14, 2026 11:07 pm / Post views : 144

विकास के दावे धरे रह गए, कंधों पर अर्थी और पैरों में कीचड़!
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कंधों पर अर्थी, पैरों में कीचड़! बिछुआ में विकास के दावों की पोल

Chhindwara 14. September 2026 छिंदवाड़ा यशो:- चुनावी मंचों से विकास के बड़े-बड़े दावे करना आसान है, लेकिन जब विकास की असली तस्वीर गांव की पगडंडी पर दिखाई देती है तो दावों और हकीकत के बीच का फर्क साफ नजर आने लगता है। छिंदवाड़ा जिले के बिछुआ क्षेत्र के बंधान माल गांव से सामने आया दृश्य विकास के दावों को आईना दिखाने के लिए काफी है। यहां बारिश के दिनों में ग्रामीणों को मुक्तिधाम तक पहुंचने के लिए करीब एक से डेढ़ किलोमीटर कीचड़ और दलदल से होकर गुजरना पड़ रहा है। हाल ही में अंतिम संस्कार के दौरान सामने आए वीडियो में ग्रामीण कंधों पर अर्थी उठाए, कीचड़ में पैर धंसाते हुए और फिसलन भरे रास्ते से गुजरते नजर आए। सवाल यह है कि जिस व्यवस्था में किसी मृत व्यक्ति की अंतिम यात्रा के लिए भी ग्रामीणों को ऐसी दुश्वारियां झेलनी पड़ें, उस व्यवस्था के विकास के दावों को आखिर किस पैमाने पर परखा जाए?

‘छिंदवाड़ा मॉडल’ के दावों पर बिछुआ की सड़क ने खड़े किए सवाल

पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ लंबे समय तक ‘छिंदवाड़ा मॉडल’ को पूरे प्रदेश के विकास के लिए उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत करते रहे हैं। लेकिन बिछुआ के बंधान माल की यह तस्वीर उस मॉडल की जमीनी पहुंच पर गंभीर सवाल खड़े करती है। ग्रामीणों का कहना है कि गांव की आबादी करीब 800 है और यहां एक ही मुक्तिधाम है। बावजूद इसके मुक्तिधाम तक पहुंचने वाला रास्ता आज भी बारिश में कीचड़ और दलदल में बदल जाता है। यानी विकास की चमकदार तस्वीरों के पीछे गांव की वह हकीकत भी मौजूद है, जहां अंतिम संस्कार जैसी मूलभूत जरूरत के लिए भी लोगों को संघर्ष करना पड़ रहा है। क्या यही वह विकास मॉडल है, जिसे पूरे प्रदेश में लागू करने का दावा किया जाता रहा? यह सवाल अब बंधान माल के ग्रामीणों की परेशानी से निकलकर सीधे राजनीतिक बहस के केंद्र में आ खड़ा हुआ है।

भाजपा सरकार के ‘विकास’ और ‘संवेदनशीलता’ के दावे भी कठघरे में

दूसरी ओर प्रदेश की भाजपा सरकार लगातार विकास, सुशासन और आमजन के प्रति संवेदनशीलता की बात करती है। सरकार गांव-गांव तक विकास पहुंचाने और ग्रामीण क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाएं मजबूत करने के दावे करती है। लेकिन बंधान माल में मुक्तिधाम तक सड़क की यह स्थिति इन दावों के सामने भी बड़ा सवाल खड़ा करती है। यदि किसी गांव में बारिश के दौरान एक शव को मुक्तिधाम तक ले जाने के लिए भी ग्रामीणों को दलदल से जूझना पड़े, तो फिर सवाल केवल सड़क का नहीं है। सवाल है कि सरकार की विकास योजनाओं की निगरानी आखिर जमीन पर कौन कर रहा है?

शिकायतें होती रहीं, रास्ता नहीं बदला

ग्रामीणों के अनुसार मुक्तिधाम तक सड़क निर्माण की समस्या को लेकर सरपंच और संबंधित अधिकारियों से शिकायतें की गईं, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ। बारिश आते ही रास्ता फिर उसी हालत में पहुंच जाता है। विडंबना यह है कि सरकारें योजनाओं, सड़कों और विकास कार्यों के आंकड़े गिनाने में पीछे नहीं रहतीं, लेकिन गांव की जरूरत की एक छोटी-सी सड़क भी यदि वर्षों से उपेक्षित पड़ी हो तो उन आंकड़ों की चमक पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

विकास की चमक बनाम गांव की कड़वी तस्वीर

एक तरफ विकास के बड़े-बड़े दावे, करोड़ों की योजनाओं की घोषणाएं और गांवों को सुविधाओं से जोड़ने की बातें हैं, तो दूसरी तरफ बंधान माल में अर्थी को कंधा देने वालों के पैर कीचड़ में धंस रहे हैं। यह तस्वीर किसी राजनीतिक भाषण की नहीं, बल्कि जमीन पर मौजूद समस्या की है। यही कारण है कि बंधान माल के ग्रामीण अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि मुक्तिधाम तक पक्की और सुगम सड़क चाहते हैं। सवाल सीधा है—जब विकास की योजनाएं गांव तक पहुंच सकती हैं, सरकारी तंत्र गांव तक पहुंच सकता है, जनप्रतिनिधि गांव तक पहुंच सकते हैं, तो मुक्तिधाम तक सड़क क्यों नहीं पहुंच सकती? बंधान माल की यह तस्वीर कमलनाथ के ‘छिंदवाड़ा मॉडल’ और मौजूदा भाजपा सरकार के ‘विकास एवं संवेदनशील शासन’—दोनों दावों की जमीनी परीक्षा ले रही है। अब देखना यह है कि इस तस्वीर को देखकर जिम्मेदारों की नींद टूटती है या फिर यह भी बारिश के साथ कीचड़ में दबकर रह जाती है।
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