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खून से लाल परंपरा: पत्थरों की बरसात और अधूरी प्रेमकथा का बदला

Dainik Yashonnati

Dainik Yashonnati / Aug 24, 2025 02:46 am / Post views : 964

खून से लाल परंपरा: पत्थरों की बरसात और अधूरी प्रेमकथा का बदला
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छिंदवाड़ा, पांढुर्णा यशो:- यह मेला अब एक अनोखी परंपरा का पोशाक बन चुका है, जहाँ हर साल आस्था के नाम पर खूनी खेल खेला जाता है।

समाज ने इसे धार्मिक मान्यता दे दी है, लेकिन इसकी असलियत पत्थरों और खून से सनी पड़ी है।

हर वर्ष इस मेले में ऐसा संघर्ष होता है, जिस पर न प्रशासन की समझाइश असर करती है और न ही कानून की सख्ती।

सैकड़ों वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज भी खतरनाक रूप लेकर सामने आती है।

बड़ी संख्या में लोग घायल होते हैं और कई तो अपनी जान तक गंवा बैठते हैं।

प्रशासन की नाकामी और भीड़ का जुनून

मेले से पहले धारा 144 लागू होती है, पुलिस बल तैनात किया जाता है, रबर की गेंदें बाँटकर हिंसा रोकने की कोशिश की जाती है।

मगर भीड़ अपने जुनून में किसी की नहीं सुनती।

शराब और जुए की मौजूदगी हालात को और खतरनाक बना देती है।

अब तक 14 से अधिक लोग मौत के शिकार हो चुके हैं और सैकड़ों स्थायी रूप से अपाहिज हो गए।

प्रेमकथा से उपजा खूनी संघर्ष

किवदंती के अनुसार, यह परंपरा एक अधूरी प्रेमकथा से जन्मी।

कहा जाता है कि पांढुर्णा का युवक सावरगाँव की युवती से प्रेम करता था।

दोनों विवाह करना चाहते थे, लेकिन युवती का परिवार विरोध में था।

युवक युवती को जाम नदी पार कराकर पांढुर्णा ले जाने लगा, तभी सावरगाँव के ग्रामीणों ने पत्थरों की बरसात कर दी।

युवक की ओर से पांढुर्णा के लोग भिड़ गए।

संघर्ष इतना भयानक हुआ कि प्रेमी-प्रेमिका दोनों की मौत हो गई।

तब से हर साल वही घटना दोहराई जाती है— पत्थरों की जंग के रूप में।

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माँ चंडिका की आस्था और झंडे की जीत

मेले की शुरुआत माँ चंडिका की पूजा से होती है।

जाम नदी के बीच पलाश का पेड़ गाड़कर झंडा लगाया जाता है।

पत्थरबाजी तब तक चलती है, जब तक कोई पक्ष वह झंडा निकालकर माँ चंडिका के चरणों में न चढ़ा दे।

घायल लोग भी मंदिर की भभूत लगाकर दोबारा संघर्ष में कूद पड़ते हैं।

आस्था या अंधविश्वास?

गोटमार मेला आस्था और परंपरा के नाम पर एक बर्बर खेल बन चुका है।

आज जब समाज शिक्षा और आधुनिकता की ओर बढ़ रहा है, तब सवाल यही है—

क्या इस खूनी परंपरा पर विराम लगेगा?

या फिर आने वाले वर्षों में भी पांढुर्णा की जाम नदी हर पोला पर्व के बाद खून से लाल होती रहेगी?

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