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धर्मसिवनी

भगवान शंकर कलयुग में त्रिभुवन के जगद्गुरु माने जाते हैं : निर्विकल्प स्वरूप जी

 
सिवनी यशो:- जहां हरि और हर की निंदा होती हो,वहां से चले जाना ही उचित है। भगवान शंकर ने विष्णु की भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें सुदर्शन चक्र प्रदान किया । जब तक सदाचार है, तब तक पराजय नहीं हो सकती । नवीन सृष्टि की रचना करने के लिए ही पुरानी का संहार करते हैं शिव शंकर।
उक्त आशय के प्रेरक प्रवचन ,पंच दिवसीय शिवमहिम्न: स्तोत्र सत्संग महोत्सव सिवनी ,के चौथे दिवस पर “श्री गुरुरत्न चरण अनुरागी” गीता मनीषी ब्रह्मचारी निर्विकल्प स्वरूप जी” के मुखारविंद से नि:सृत हुए।

पूज्य ब्रह्मचारी जी ने गंधर्वराज पुष्पदंत रचित शिव महिमा स्त्रोत के गूढ रहस्य का , सहज सरल भाषा में लौकिक दृष्टांतों के माध्यम से शिव भक्तों को हंसते हंसाते हुए सुंदर चित्रण प्रस्तुत किया।
आज के कथा प्रसंग में ब्रह्मचारी जी ने शिव महिमा स्त्रोत के श्लोक नंबर 18 से 24 तक के श्लोक की सरल व्याख्या करने,भूमिका सृजन करते हुए कहा कि, नूतन सृष्टि बनाने शिव शंकर पुरानी का नाश करते हैं । जो शंकर को याद करता है शंकर उसे पर दया करते हैं। कलयुग में भगवान शंकर को ही जगतगुरु माना गया है। त्रिलोक की रक्षा करने हेतु भगवान शंकर को स्वयं अपने ही भक्तों को मारना पड़ा।

इस प्रसंग मैं शिवजी के पुत्र भगवान “कार्तिकेय द्वारा तारकासुर वध की कथा” ,भगवान ब्रह्मा विष्णु तथा देवताओं की स्तुति पर शंकर जी ने अपने ही भक्त “त्रिपुरासुर वध”का प्रसंग सुनाया। पुष्पदंत ने शिव स्तुति में कहा कि, त्रिपुरासुर का वध करने के लिए “ब्रह्मांडमयी रथ” बनाने का आडम्बर करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। किंतु देवताओं को पशु ( बंधन मुक्त) करने, शिव शंकर ने पशुपतिनाथ की लीला किया था ।

अगले श्लोक के अर्थ में निहित ,भगवान विष्णु द्वारा की गई शिव आराधना के फल स्वरुप शंकर जी द्वारा उन्हें आमोद अस्त्र “सुदर्शन चक्र” प्रदान करने का प्रसंग सुनाया गया। ब्रह्मचारी जी ने प्रवचन माला को आगे बढ़ते हुए “दक्ष प्रजापति के यज्ञ का विध्वंस” की कथा विस्तार से सुनाया । पशचात ब्रह्मा विष्णु तथा देवताओं की प्रार्थना पर पुन: यज्ञपूर्ण करने का , वृतांत सुनाते हुए हुए ब्रह्मचारी जी ने कहा कि ,कर्म फल नष्ट हो जाने पर भी भगवान शिव सबको कर्मों का फल प्रदान करते हैं। हरी और हर में भेद रखना अज्ञानता है । यज्ञ कर्ता की श्रद्धा के अनुसार यज्ञ फल प्राप्त होता है ।
ब्रह्मचारी जी ने कथा प्रसंग को आगे बढ़ते हुए “अर्धनारीश्वर स्वरूप” शिव-शिवा ,अरुण और अरुणा, शिव और शक्ति के अभेद स्वरूप का वृतांत सुनाया ।

आज के प्रवचन को विराम देते हुए ब्रह्मचारी जी ने कहा कि भले ही भगवान शंकर अमल वेषधारी हैं, किंतु उनका स्मरण मंगलकारी ही होता है ।
गीता पराभक्ति मंडल अध्यक्ष-सिवनी, विद्वान “आचार्य पंडित सनत कुमार उपाध्याय जी” ने ब्रह्मचारी जी की प्रवचन माला को अभूतपूर्व निरूपित करते हुए कहा कि शिव महिमा से संबंधित विभिन्न धर्म शास्त्रों में उल्लिखित विस्मयकारी प्रसंगों को हम ब्रह्मचारी जी के मुखारविंद से पहली बार सुनकर, स्वयं को सौभाग्यशाली मानते हैं। आचार्य जी ने समस्त श्रद्धालु शिव भक्तों से, “प्रवचन माला के समापन दिवस 4 अगस्त रविवार” को प्रवचन पंडाल समृति लान पहुंचकर धर्म लाभ अर्जित करने का आवाहन किया है।

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