सिवनी यशो:- श्रीमद भागवत श्री हरि विष्णु का श्रीविग्रह है, अपने जीवन मे भागवत कथा नही सुनने वाला आत्मघाती हैं, सिवनी गंगा और गुरु का परम-पावन-पवित्र स्थान है।
उक्तशय के प्रवचन द्वीपीठाधीश्र्व जगतगुरु शंकराचार्य ब्रह्मलीन स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज के परम स्नेही शिष्य ब्रह्मचारी श्री निर्विकल्प स्वरूप जी महाराज ने सरेखा केवलारी में आज से प्रारम्भ हुई कथा में उपस्थित भागवतवृन्दों को दिये आज प्रथम दिवस जल कलश यात्रा के साथ कथाव्यास ब्रह्मचारी निर्विकल्प स्वरूप जी महाराज को रथ में विराजमान कर कथास्थल तक शोभायात्रा के साथ लाया गया ।
महाराज जी ने कहा की श्रीमद भागवत महापुरण में श्री कृष्ण अपने संपूर्ण तेज के साथ निवास करते है, यह समुद्रप्रिय श्रीहरि विष्णु का श्री विग्रह है यह बड़ा ही विशिष्ट ग्रंथ है वस्तुत भगवान् श्री कृष्ण के ही दर्शन होते हैं, भागवत की अनंत अपार महिमा है, पूर्व जन्मों के सत्कर्म और भाग्योदय से ही सत्संग संभव होता है सनातनी प्राणी को अपनी जीवन यात्रा में श्रीमद् भागवत की कथा सुनाना अनिवार्य है जो नही सुनता हैं वह आत्मघाती है, और कथा को सुनने वाला सबसे बड़ा दानी होता है वह राम नाम के हीरे मोती लुटाते फिरता है पूज्य गुरुदेव ने बताया की भागवत की कथा सुनने की दो परंपरा है प्रथम परंपरा मे सर्वप्रथम ब्रह्मा जी ने नारद जी को और नारद जी ने वेदव्यास जी को सुनाई फिर वेदव्यास जी ने उसे विस्तारित कर शुकदेव जी को सुनाई और शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को सुनाई, जबकि दूसरी परंपरा में संकर्षण ने सनत्कुमारों को सनत्कुमारों ने संख्यायन जी को और उन्होंने बृहष्पति जी को बृहष्पति जी ने उद्धव और मैत्रेय जी को मैत्रेय ऋषि ने विदुर जी को कथा सुनाई । और साथ ही बताया की श्री मद् भागवत की चार प्रमुख श्रोता माने गए हैं । ब्रह्मचारी जी महाराज ने आज की कथा में स्कंद पुराण के अनुसार कथा श्रोताओं के प्रकार का भी वर्णन किया और कथा के वक्ता के संबंध मे बताया की विरक्त संत-महात्मा, विप्र, वैष्णव, वेद-शास्त्र का ज्ञाता, मर्मज्ञ से ही कथा श्रवण करना चाहिए और साथ ही बताया की ये सिवनी की परंम् पावन धरा है यहाँ पर हमारे पूज्य गुरुदेव जगद्गुरु देव जी का प्रकट्या यहाँ पर हुआ था यहाँ बैनगंगा निकट से ही बह रही है, अत: गंगा और गुरु का परं पावन स्थान है ये । पूज्य गुरुदेव ने कहा की संसार में सब चीज सुलभ है किन्तु सत्संग सबसे दुर्लभ है जब तक व्यक्ति सत्संग नही करता तब तक उसकी बुद्धि में प्रकाश नही आता विवेक की जगृति नही होती तो ये सत्संग की प्राप्ति तब होती है जब जब भगवान् की कृपा होती है, तब तब हमे सत्संग की प्राप्ति होती है





