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ब्राह्मणों को वेदों का अध्ययन, ब्राह्मणत्व अनुकूल नियमों का पालन करना चाहये – शंकराचार्य

धूमा में शंकराचार्य जी का महाभिनंदन,धर्मसभा

धूमा यशो:- भगवान परशुराम जी के जन्मोत्सव पर प्रथम बार धूमा पधारे ब्रम्हलीन पीठद्वयाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज के शिष्य पश्चिमाम्नाय द्वारकाशारदापीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री सदानंद सरस्वती जी महाराज का शनिवार को प्रात: 09:00 बजे धूमा आगमन हुआ । जिसमें परशुराम सेना के कार्यकर्ताओं एवं युवाओं द्वारा बाइक रैली,डीजे, ढोल के साथ महाराज श्री की भव्य अगवानी की गई और सिद्धेश्वर नगर में महाराज श्री का पादुकापूजन किया गया। इसके पश्चात नगर के मुख्य मार्ग से होते हुए शोभायात्रा निकाली गई । इस अवसर पर जगह जगह शंकराचार्य जी का पूजन स्वागत किया गया जिसमें नगर के प्रबुद्धजन एवं वरिष्ठ नागरिक सम्मिलित हुए। शोभायात्रा जब हनुमान मंदिर पहुंची तब परशुराम सेना एवं ब्राम्हण समाज धूमा द्वारा महाराज श्री की भव्य अगवानी की गई । शंकराचार्य जी ने हनुमान मंदिर पहुंचकर मूंछ वाले हनुमान जी का विधिवत पूजन किया एवं मंच में विराजित हुये । जहां धूमा ब्राम्हण समाज एवं नगर के सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ताओं द्वारा शंकराचार्य जी की पादुका में माल्यार्पण किया गया। वहीं परशुराम सेना द्वारा शंकराचार्य जी को 51किलो की गुलाब माला,पगड़ी,परशुराम फरसा,एवम महाभिनंदन कर अभिनंदन पत्र अर्पित किया गया ।
धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए पूज्य शंकराचार्य जी ने कहा कि भगवान धर्म की रक्षा करने के लिए इस भूधरा पर अवतार लेते हैं चौबीस अवतारों में भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम जी का मूल नाम राम था किन्तु जब भगवान शिव ने उन्हें अपना परशु नामक अस्त्र प्रदान किया तभी से उनका नाम परशुराम हो गया। पितामह भृगु द्वारा सम्पन्न नामकरण संस्कार के बाद वे राम कहलाए। वे जमदग्नि के पुत्र होने के कारण जामदग्न्य और शिवजी द्वारा प्रदत्त परशु धारण करने के कारण परशुराम जी कहलाए। कैलाश गिरिश्रृंग पर्वत पर स्थित भगवान शंकर के आश्रम में विद्या प्राप्त कर विशिष्ट दिव्यास्त्र विद्युदभि नामक परशु प्राप्त किया। जिस प्रकार भगवान परशुराम ने वेदाध्ययन किया और पृथ्वी की रक्षा की उसी प्रकार ब्राम्हणों को वेदवाक्य “धर्मो रक्षति रक्षित:”का भी पालन करना चाहिए जिसमें उन्हें वेदों का अध्ययन करना चाहिए,दान लेने के साथ दान करना भी चाहिए ।
ब्राम्हणों को धर्मोपदेश देते हुए शंकराचार्य जी ने कहा कि आप लोग सिर्फ दान लेते हो दान करना भी सीखो,बहुत से लोग अपने लिए भगवान शब्द का प्रयोग करते हैं उन्हें ये बात समझ लेनी चाहिए कि भगवान का स्वरूप क्या है जिन भगवान ने अवतार लिया है उनकी शक्ति क्या है,उनका वैभव क्या है,उनका वाक् वैभव क्या है,किसे भगवान कहेंगे,कहते हैं जिसमें समस्त ऐश्वर्य है,समस्त ज्ञान है,समस्त धर्म है,समस्त बुद्धि है,समस्त यश है,वह भगवान नाम से जाना जाता है समग्र ऐश्वर्य का जो धारक है उसे भगवान कहते हैं,जो मनुष्यों को धर्म पर चलने का मार्ग प्रशस्त करे उसे भगवान कहते हैं, ब्राम्हणत्व की रक्षा भगवान परशुराम जी ने की,प्रसंग आता है कि जब राजा जनक के यहां माता सीता का स्वयंवर हो रहा था तब श्री राम ने शिव धनुष उठाया धनुष पर बाण चढ़ा दिया प्रत्यंचा खींची और कहा कि बताओ ये बाण कहा छोड़ें,बाण जहां छोड़ेंगे लोकालोक भस्म हो जायेंगे परशुराम जी घबरा गए कि अब क्या होगा परशुराम जी ने कहा ही प्रभु आप नित्य,शुद्ध, बुद्ध,परमात्मा हैं आप अपने इस बाण से किसी को नष्ट मत कीजिए आप मेरे पुण्य और पाप को नष्ट कर दीजिए,निर्मल मन वाला ही भगवान को पा सकता है ।
ब्राम्हण जन्म लेते ही पृथ्वी का स्वामी हो जाता है क्योंकि परशुराम जी ने संकल्प करके सारी पृथ्वी ब्राम्हणों को दान दे दी थी ये भारतभूमि है,पुण्यात्माओं की भूमि है,और यही अवतार सिद्ध होते हैं,भारत पूरे विश्व का आंगन है,गौरव की बात है कि हमें आपको ब्राम्हण का शरीर प्राप्त हुआ है,परमात्मा ने सभी शरीरों को उत्पन्न किया है चौरासी लाख योनियों की रचना की लेकिन जब मनुष्यों की रचना की तब मनुष्य की रचना को देखकर बहुत प्रसन्नता हुई,इसलिए ब्राम्हणों को अपने धर्म का पालन करना चाहिए,विचार करना चाहिए, क्षत्रिय, वैश्य आदि सभी आपको प्रणाम करते हैं,कौन सी शक्ति आपके पास है,जिसके कारण सभी लोग ब्राम्हण को प्रणाम करते हैं,उसके चरणों में अपना मस्तक रखते हैं, उस संपत्ति की रक्षा करना ही ब्राम्हण का ब्राम्हणत्व है,मन का निग्रह करना, इंद्रियों का निग्रह करना, तपस्या करते रहना,सदाचार का पालन करते रहना,अध्ययन करना, अध्यापन करवाना,यज्ञ करना और यज्ञ करवाना,दान लेना और दान करना चाहिए सिर्फ लेना लेना ही ब्राम्हणों के लिए नही कहा गया है, ये बात सदा ध्यान में रखें ब्राम्हण होते हुए,सदाचार करते हुए बहुत से ब्राम्हण दुखी रहते हैं उसका क्या कारण है,क्योंकि वे दान लेते ही रहते हैं देते नही हैं दान करना भी चाहिए। ब्राम्हणों को शिखा सूत्र धारण करना,तिलक लगाना,यज्ञोपवीत धारण करना,प्रतिदिन देवालय जाना,लोगों को धर्मोपदेश देना चाहिए,देवता मंत्रों के अधीन हैं,मंत्र ब्राम्हणों के वश में है,इसलिए ब्राम्हणों को अपनी शक्ति सुरक्षित रखना चाहिए।

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