बुढ़ापे में नींद अपने आप कम हो जाती है। बुढ़ापे में भोजन भी कम हो जाता है। सच तो यह है की बुढ़ापे के लिए ठीक भोजन है, क्योंकि बूढ़ा फिर बच्चे जैसा हो जाता है। फिर उसका जीवन उतना ही सिमित हो जाता है जैसे छोटे बच्चे का, अब कुछ जीवन में निर्माण तो होता नहीं, दूध काफी है। और नींद कम हो जाती है अपने आप, बच्चा माँ के पेट में सोता है चौबीस घंटे, पैदा होने के बाद बाईस घंटे सोता है.। फिर सोलह घंटे सोयेगा, जवान होते होते आठ घंटे सात घंटे सोयेगा, यह स्वाभविक है। जैसे जैसे बूढ़ा होने लगेगा नींद कम होने लगेगी, क्योंकि नींद की एक जरुरत है…वह है शरीर के अंदर टूट गए तंतुओं का निर्माण, बूढ़े आदमी के तंतुओं का निर्माण होना बंद हो गया है, इसलिए नींद की जरुरत न रही।
बच्चा चौबीस घंटे सोता है माँ के पेट में, क्योंकी हज़ार चीजें निर्मित हो रहीं हैं, नींद चाहिए। गहरी नींद चाहिए ताकि कोई बाधा न पड़े, सब काम चुपचाप होता रहे, नींद के अँधेरे मे निर्माण होता है। इसलिए तो बीज ज़मीन में अंदर चला जाता है, वहां फूटता है, रोशनी में नहीं फूटता चट्टान पर रखा हुआ। अँधेरा चाहिए, इसलिए वीर्य कण माँ के गर्भ में चला जाता है अँधेरे में, वहां जाकर विकसित होता है। अँधेरा चाहिए, गहरी नींद चाहिए, विश्राम चाहिए, बुढ़ापे में नींद अपने आप खत्म होने लगती है। यह कोई अनिद्रा रोग नहीं है। अब कोई बूढ़ा चाहे की आठ घंटे सोये, यह संभव नहीं, उसकी जरूरत ही नहीं रही, पांच घंटे की नींद ही बुढ़ापे में काफी है।




