राम कथा जीने की और भागवत कथा मरने की कला सिखाती है – स्वामी प्रज्ञानानंद
सिवनी 16 अप्रैल 2023

सिवनी यशो: – जीव प्रकृति के आधीन होता है और प्रकृति परामात्मा के आधीन होती है परंतु मनुष्य प्रकृति को छोड़कर प्रवृति और विकारों के के की गुलामी में फंस जाता है लोभ मोह माया के फेर में पड़ जाता है और बार बार मृत्यु लोक में उसे आना पड़ता है श्रीमद भागवत मृत्यु लोक के इस क्लेश से बचाने का सुमार्ग बताती है परमात्मा की प्राप्ति की और परमात्मा में समा जाने का युक्ति बताती है । भागवत कथा हमें मरना सिखाती है जबकि श्रीराम कथा हमें जीना सिखाती है । हमें जीना कैसे है और मरना कैसे है यह दोनों सीखना जरूरी है । उक्ताशय का मंतव्य राजश्री पैलेस में भागवत कथा की व्यास पीठ से ब्रम्हलीन द्विपीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती जी महाराज के परम प्रिय शिष्य महामंडलेश्वर दंडी स्वामी प्रज्ञानानंद जी महाराज ने व्यक्त किये ।
महाराज श्री ने कहा कि शांत और सत्य के साथ रहना हमारा प्राकृतिक ईश्वर प्रदत्त स्वाभाव है । क्रोध, दुर्भावना, दुराग्रह असत्य को हमने जन्म देते है जबकि शांति और सत्य परमात्मा का स्वरूप है । इस सत्य को पाना हर जीव की चाहत होती है और इसके लिये वह निरंतर यात्रा करता है । महाराजश्री ने कहा कि हम परमात्मा के अंश है और इसका अंत परमात्मा में मिलने से ही होगा। भागवत की शरण में जो आ जाता है वह स्वयं भागवत हो जाता है परमपिता परमेश्वर का हो जाता है परंतु इसका श्रवण और मनन निरंतर होना चाहिये। महाराज श्री ने पवित्र कथा गंगा का प्रवाह करते हुये भागवत कथा के चरित्रों का सुंदर वर्णन करते हुये कथा के गूढ रहस्यों को प्रतिपादित करते हुये बताया कि लक्ष्मी को माता के रूप में या पुत्री के रूप में पूजा जाना चाहिये माता वह सब देती है जो पुत्र को आवश्यक होता हेै और पुत्री जैसे जैसे बढ़ती है उसे धर्म के मार्ग में प्रवृत किया जाता है अर्थात जब धन बढ़ता है तो उसका सदुपयोग अच्छे कामों में करना चाहिये।
भागवत कथा के सुंदर चरित्रों का वर्णन करते हुये भगवान कृष्ण और जामवंत प्रसंग,कृष्ण जी के प्रदुम्र द्वारा संभासुरवध, सुदामा चरित्र का वर्णन करते हुये आज कथा को विश्राम दिया गया कथा विश्राम के पश्चात कथा स्थाल पर महाप्रसाद का वितरण किया गया ।



