बिठली ग्राम पंचायत में तालाब गहरीकरण के नाम पर अवैध पत्थर उत्खनन का आरोप, सरपंच-सचिव पर किसानों ने लगाए गंभीर आरोप
गांव में मौत की खाई बन रहा तालाब, पानी देना भी बंद - किसानों में आक्रोश
Seoni 18 November 2025
सिवनी यशो:- जिला मुख्यालय से लगे ग्राम पंचायत बिठली में तालाब गहरीकरण के नाम पर अवैध पत्थर उत्खनन और स्टोन क्रेशर संचालक को लाभ पहुंचाने की कथित साजिश सामने आई है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि सरपंच और सचिव ने रूपए की लालच में तालाब निर्माण के नाम पर गहरी खाई जैसा तालाब बनाने की तैयारी कर ली है। इस कार्य के लिए उन्होंने ग्रामीणों की आपत्तियों को नजरअंदाज करते हुए बालाजी मेटल्स संचालक केशव अग्रवाल को पत्थर परिवहन की अनुमति देने आवेदन किया।
ग्रामीणों की शिकायत पर कलेक्टर श्रीमती शीतला पटेल ने जांच टीम गठित की। जांच में यह चौकाने वाला तथ्य सामने आया कि जिस खसरा नंबर 34 पर तालाब बनाने का प्रस्ताव दिया गया है, वह सरकारी रिकॉर्ड में ‘बड़ा झाड़ का जंगल’ दर्ज है।
जांच में सामने आए तथ्य
✔️ खसरा 34 पर पहले से ही गहरी खाईनुमा तालाब मौजूद
✔️ नया तालाब नहीं, बल्कि पत्थर और मुरम उत्खनन की तैयारी
✔️ भूमि श्रेणी — बड़ा झाड़ का जंगल (शासकीय वन क्षेत्र)
✔️ पत्थर परिवहन के लिए सिर्फ बालाजी मेटल्स का नाम
जैसे ही जांच टीम मौके पर पहुंची, सरपंच-सचिव और क्रेशर संचालक में हड़कंप मच गया। ग्रामीणों ने स्पष्ट बताया —
👉 तालाब की कोई आवश्यकता नहीं
👉 वास्तविक उद्देश्य — पत्थर की अवैध खुदाई और बिक्री
किसानों को पानी देना बंद – सरपंच की बदले की कार्रवाई?
ग्रामीणों का आरोप है कि शिकायत सामने आने के बाद सरपंच ने बौखलाहट में तालाब से किसानों को पानी देना बंद कर दिया। इससे सिंचाई संकट उत्पन्न हो गया है।
“क्या प्रशासन की शक्ति और माफिया के गठजोड़ का टकराव शुरू हो गया है?” — ग्रामीणों का सवाल
संभावित खतरे
यदि खसरा 34 पर दोबारा खुदाई हुई तो—
🔹 तालाब खतरनाक गहराई में बदल जाएगा
🔹 मानव और पशुओं के गिरने से हादसे की संभावना
🔹 जंगल क्षेत्र में पर्यावरणीय क्षति
🔹 जलस्तर प्रभावित होने का खतरा
ग्रामीणों की प्रशासन से मांग
🛑 पत्थर उत्खनन की अनुमति तुरंत रद्द की जाए
📋 मौके का मैदानी निरीक्षण किया जाए
👤 जिम्मेदारों पर कड़ी प्रशासनिक कार्रवाई हो
🚜 किसानों को पुनः पानी उपलब्ध कराया जाए
🌳 जंगल क्षेत्र की सुरक्षा के लिए कानूनी हस्तक्षेप हो
यह सिर्फ तालाब निर्माण का मामला नहीं रहा, बल्कि—
🟥 प्रशासनिक विश्वसनीयता बनाम माफिया गठजोड़
🟥 पर्यावरण संरक्षण बनाम ठेकेदार लाभ
🟥 किसानों के अधिकार बनाम सत्ता का तानाशाही उपयोग





