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राजनीति जितनी खतरनाक हो रही है उतना खतरनाक कोई हथियार विकसित नहीं हुआ

स्वाधीनता दिवस पर दैनिक यशोन्नति के संपादक मनोज मर्दन त्रिवेदी की विशेष संपादकीय लेख

भारत अपने दीर्घ काल से ही गणतंत्रात्मक व्यवस्थाओं का संवाहक रहा है भले ही स्वतंत्रता और पराधीनता के पूर्व राजतांत्रिक व्यवस्थाएं चलती रही हों परंतु उन व्यवस्थाओं मे भी जनभावनाओं के लिये उच्च कोटी का स्थान था आज के गणतंत्र मे भले ही लिखित संविधान के रूप मे सत्ता जनता के हाथ मे निहीत हो परंतु जनभावनाओं का वह सम्मान इस व्यवस्था मे भी जिस रूप मे दिखाई दे रहा है वह लोकतांत्रिक व्यवस्था का सही स्वरूप नही है। भारत के लोकतंत्र पर धनबल और सत्ता के केंद्र बिंदु बने चंद व्यक्तियों द्वारा इसको विकृत रूप से संचालित किया जा रहा है। अधिकारों के नाम पर प्रायोजित रैलियां धरने प्रदर्शन करने मे ही देश के बड़े वर्ग का दुरूपयोग किया जा रहा है, असमानता की दीवारें इतनी ऊंची होती जा रही है कि समान अधिकार की कल्पना नही की जा सकती है। लोकतंत्र के जो प्रमुख बिंदु हैं जिनसे लोकतंत्र सुदृढ दिखाई दे सकता है उन बिंदुओं पर भी देश के कर्णधारों ने ऐसे विकृत समझौते किये हैं जिससे भारत मे सफल लोकतंत्र की विकृत्तियां दूर करना असान नही है ऐेसे बिंदुओं मे शिक्षा प्रमुख है परंतु शिक्षा के स्वरूप और शिक्षित करने के मायने केवल हस्ताक्षर करा लेने तक ही सीमित कर दिये गये हैं संस्कार और संस्कृति शिक्षा के मूल स्वरूप और शिक्षित समाज की जो कल्पना है वह वर्तमान शिक्षा मे दिखाई नही दे रही है। शिक्षा के माध्यम से चरित्र निर्माण स्वतंत्र भारत मे हुआ हो। वर्तमान मे उत्पन्न स्थिति से ऐसा कही दिखाई नही दे रहा है कहा जा सकता है कि शिक्षा के नाम पर पिछले 75 वर्षो से केवल प्रयोग ही हो रहे हैं पूरे देश मे शिक्षा मे सुधार के नाम पर जो आवाजें उठती हैं उनमे ग से गणेश पढ़ाने को सांप्रदायिक गीता को पढ़ाना सांप्रदायिक और भगवाकरण के नाम पर विरोध के स्वर सुनायी देते हैं परंतु 75 वर्षो की शिक्षा मे भगवाकरण के विरोध के कारण जो भ्रष्टाचारी करण हुआ है उस बात की गैर भगवाई चोला पहनने वालो ने कोई चिंता की हो ऐसा भी कहीं दिखाई नही देता लोकतंत्र का सबसे बड़ा मंदिर संसद आज उसी शिक्षा जिसमे बुद्धिमान गणेश को पढऩे का विरोध है वहां जिम्मेदारी संभालने वाले अनेक ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होने देश को पूरे विश्व पटल पर शर्मसार किया है। राजनीति लोकतंत्र का अहम पहलू है परंतु राजनैतिक दलों की बड़ी पवित्र नीतियां भी चरित्र पूर्ण शिक्षा न होने के कारण कलंकित हो रही हैं कोई एक राजनैतिक दल के नेता भ्रष्ट हों ऐसा नही है हर राजनैतिक दल के नेताओं के चरित्र के कारण देश का गौरव और यह गणतंत्र कलंकित हो रहा है। वोट की राजनीति जितनी अधिक खतरनाक होते जा रही हैं उससे राष्ट्र को परम वैभव पर ले जाने की कल्पना भी नही की जा सकती। सड़को पर दुष्शासन द्रोपतियों के चीरहरण कर रहे हैं उनको नियंत्रित करने वाला सही तंत्र भी सफेद पोशो के कारण विफल होते नजर आ रहा है। वोट की राजनीति का खेल जितना अधिक खतरनाक हो गया है उतना कोई घातक हथियार किसी देश ने आज तक विकसित नही किया है। यह बात देश का युवा धीरे-धीरे समझ रहा है और वह यदि सही दिशा मे आगे बढ़े और किसी अच्छे नेतृत्व ने उसे दिशा दे दी तो देश की दशा बदलने की संभावना की जा सकती है। भारत अपने प्रारंभिक काल से ही जब-जब भटकाव के दौर से गुजरा है उसे भाग्य विधाता ईश्वरी कृपा से प्राप्त हुये हैं ऐसी ही अपेक्षा आगामी समय के लिये भी की जा सकती है। की कोई न कोई महान व्यक्तित्व आगे आकर देश की युवा शक्ति को नेतृत्व प्रदान कर उस शक्ति के माध्यम से सारी अव्यवस्थाओं को राजनीति से लेकर विद्या के मंदिरों तक छोटी हाट बजारों से लेकर उद्योगो और सड़क से लेकर संसद तक की व्यवस्था को सुधारने मे सार्थक दिशा मे कार्य करेगा। जो गणो का तंत्र चंद हाथो मे सिमट कर रह गया है उसे सर्व व्यापी साधिकार बनाने के लिये युवाओं की शक्ति को जागृत करने वाला सिद्ध होगा।
दूसरी अहम बात यह बहुत चिंता जनक है कि भारत के स्वाभिमान और सशक्तिकरण के लिये जिन नारों का सहारा लिया जाता रहा है वह नारे उतनी ही तेजी से विफल हुये है । भारत में स्वादेशी करण का नारा एक समय बहुत तेजी से उठा जिस समय विदेशी वस्तुओं के बहिस्कार की बयार चल रही थी उस विदेशी वस्तुओं की पहुँच घर घर में बहुत कम मात्रा में थी आज हर घर में चीनी वस्तुओं का अंबार लगा हुआ है इसके साथ ही अन्य दैनिक उपयोग की विदेशी वस्तुएँ हमारे पारिवारिक वैभव के प्रतीक बन गये है । भागदौड़ भरी जिंंदगी में किसी को चिंता नहीं है कि हमारी मंजिल क्या है और हम जा कहाँ रहे है । देश भक्ति अब एक फैशन बन गयी है नारों में सिमट गयी है हमारे आदर्श विदेशी कल्चर के गुलाम हो रहे है । यह भगमभाग वाली जिंदगी भविष्य को बहुत भयावह बनाने वाली है । आज प्रधानमंंत्री नरेन्द्र मोदी यदि आत्मनिर्भर भारत के निर्माण की बात कर रहे है तो यह सुनहरे भविष्य का सपना है परंतु यह भी यदि नारों में उलझ गया तो हम अपनीआने वाली पीडियों को आर्थिक गुलामी वाला निकम्मा भारत सौंपकर जाने वाले है यह सुनिश्चित मान लेना चाहिये । सुनहरे भारत का निर्माण वर्तमान पीढ़ी करने का सामर्थ रखती है आज भारत में युवा शक्ति का वर्चस्व है ।

Dainikyashonnati

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