जो व्यक्ति अभी हमें बुरे और अपने शत्रु प्रतीत होते हैं, उनके कुछ अपकारों की बात सोचना छोड़कर यदि उनके उपकारों को, उनके द्वारा किए हुए सद्व्यवहार को स्मरण करें ती निश्चय ही वे हमें शत्रु नहीं, मित्र दिखाई पड़ेंगे।
पिता-माता ने हमें एम० ए० तक नहीं पढ़ाया, यदि वे उतनी शिक्षा दिला देते, तो आज हम ऊँची सर्विस प्राप्त करते, यह विचार मन में आने पर माता-पिता शत्रु जैसे प्रतीत होते हैं; उनके प्रति अपना द्वेष एवं दुर्भाव उत्पन्न होता है, पर यदि हम अपनी विचारधारा, बदल दें और जिन आर्थिक कठिनाइयों में रहते हुए, उतने बड़े कुटुम्ब का पालन करते हुए, हमारा पालन-पोषण किया एवं जितनी संभव थी उतनी शिक्षा की व्यवस्था की उसका चिन्तन करें; तो उनके उपकारों के प्रति मन श्रद्धा से झुक जायेगा और वे मित्र ही नहीं देवता के समान उपकारी प्रतीत होंगे।
दृष्टिकोण में थोड़ा अन्तर कर देने से हम असन्तुष्ट और खिन्न जीवन को सन्तोष में परिणत कर सकते हैं। ईश्वर ने सुर-दुर्लभ मानव-तन प्रदान करके इतनी बहुमूल्य सम्पदा हमें प्रदान की हैं कि उसका मूल्य लाखों-करोड़ों रुपयों में भी नहीं कूता जा सकता।
जैसा शरीर, कुल, सम्मान, विद्या, परिवार आदि अपने को प्राप्त हैं, उसमें से प्रत्येक की विशेषता और सुविधा का चिन्तन करें-साथ ही यह भी सोचें कि यदि यह बातें उपलब्ध न होतीं, तो उनके अभाव में अपना जीवन कितना नीरस होता, तो इस चिन्तन से हमें प्रतीत होगा कि हमारी वर्तमान परिस्थिति दुःख-दारिद्र से भरी नहीं सुख-सुविधाओं से सम्पन्न हैं।
परिस्थितियों के अतिरिक्त हमारी मानसिक अशान्ति का एक कारण यह भी है कि हमें अच्छे व्यक्तियों का अभाव दिखाई देता है। यह भी चिन्तन-दोष की ही फलश्रुति है। प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तित्व अच्छाइयों और बुराइयों दोनों से मिलकर बना हुआ है। किसी में बुराइयाँ ही हों, ऐसा भी नहीं है और यह भी नहीं है कि किसी व्यक्ति में समस्त अच्छाइयाँ हों। हर व्यक्ति में अच्छाइयाँ भी हैं और बुराइयाँ भी हैं।
अपनी दृष्टि जिस पक्ष पर जाती है, वही पक्ष हमें दिखाई देने लगता है और अपनी पसन्द के अनुसार हम अच्छाइयाँ या बुराइयाँ खोज लेते हैं। यदि बुराइयाँ ही ढूंढी जाएँ तो वे भगवान में भी मिल जायेंगी और अच्छाई देखनी हो तो सिंह सरीखे हिंसक पशु में भी उनका अभाव न दिखेगा।
दूसरे व्यक्ति इसलिए दुष्ट और घृणित लगते हैं कि उनमें दोष ही दोष देखे गए हैं। अपने प्रिय स्वजन अच्छाइयाँ देखते रहने के कारण प्राणप्रिय लगने लगते हैं। यहाँ तक कि उनकी बुराइयाँ भी अच्छी दिखाई देने लगती हैं।
अतएव दोष-दर्शन, छिद्रान्वेषण की आदत छोड़कर गुण-दर्शन की वृत्ति विकसित कर ली जाय, तो कल तक जो व्यक्ति शत्रुवत् लगते थे, वही मित्रवत् लगने लग जायेंगे।




