अंत्योदय से राष्ट्रोदय तक: दीनदयाल उपाध्याय के विचारों पर चलती मोदी सरकार
(11 फ़रवरी पं. दीनदयाल उपाध्याय पुण्यतिथि पर विशेष)
✍️ – सुरेन्द्र शर्मा

प्रदेश उपाध्यक्ष, भाजपा मध्यप्रदेश
संभाग प्रभारी, भाजपा निमाड़ संभाग
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भारत को अगर विश्व गुरु बनाना है तो उसका आधार केवल भारत का ही चिंतन हो सकता है। पश्चिम के आधार पर चलकर हम केवल पश्चिमी देशों के पिछलग्गू तो बन सकते हैं, लेकिन दुनिया का नेतृत्व नहीं कर सकते। भारत को अपने स्व को पहचानकर आगे बढ़ना होगा। यही चिंतन आधुनिक भारत के समस्त मनीषियों का रहा है।
इसी भारतीय चिंतन को “एकात्म मानव दर्शन” के रूप में प्रतिपादित करने वाले भारतीय जनसंघ के तत्कालीन राष्ट्रीय महामंत्री पंडित दीनदयाल उपाध्याय थे। उन्होंने भारत के स्व को पहचानकर, भारतीयता के आधार पर भारत के स्वर्णिम भविष्य का स्वप्न देखा। उन्होंने समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति की भी चिंता की और स्पष्ट कहा कि जब तक समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति का उद्धार नहीं होगा, तब तक राष्ट्र का अपने बल पर खड़ा होना संभव नहीं है। “अंत्योदय से ही राष्ट्रोदय संभव है” का मंत्र देने वाले पंडित दीनदयाल उपाध्याय आज भारतीय जनता पार्टी के प्रेरणापुंज और जनसंघ के आधार स्तंभ हैं।
नियति ने 11 फ़रवरी 1968 को उन्हें हमसे छीन लिया, लेकिन उनके बताए मार्ग पर चलकर प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार तथा देश के 19 राज्यों में भाजपा एवं भाजपा गठबंधन की सरकारें पंडित दीनदयाल उपाध्याय के स्वप्न को साकार कर रही हैं।
एकात्म मानव दर्शन: भारतीय जीवन दृष्टि
पंडित दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानव दर्शन का मूल उद्देश्य मनुष्य को केवल आर्थिक प्राणी न मानकर उसे शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा का समन्वित रूप मानना है। यह दर्शन भारतीय संस्कृति, परंपरा और जीवन मूल्यों पर आधारित है। वर्तमान समय में यदि भारत की राजनीति में इस दर्शन की व्यावहारिक अभिव्यक्ति देखी जाए, तो प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार में इसके तत्व स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।
एकात्म मानव दर्शन का आधार यह है कि समाज, राष्ट्र और व्यक्ति एक-दूसरे से अलग नहीं हैं, बल्कि एक अखंड इकाई के रूप में जुड़े हुए हैं। यह दर्शन पश्चिमी विचारधाराओं—पूंजीवाद और साम्यवाद—दोनों से भिन्न है। जहाँ पूंजीवाद व्यक्ति को केंद्र में रखता है और साम्यवाद राज्य को, वहीं एकात्म मानव दर्शन समाज और संस्कृति को केंद्र में रखता है।
इस दर्शन के अनुसार विकास केवल भौतिक नहीं, बल्कि नैतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक भी होना चाहिए। अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक विकास पहुँचाना ही इसका उद्देश्य है, जिसे “अंत्योदय” कहा गया है।
मोदी सरकार और अंत्योदय की अवधारणा
नरेन्द्र मोदी जी की सरकार ने शासन को केवल सत्ता का माध्यम नहीं, बल्कि सेवा का साधन माना है। “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास” का नारा एकात्म मानव दर्शन की भावना को ही प्रतिबिंबित करता है।
जन-धन योजना के माध्यम से गरीबों को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ा गया। प्रधानमंत्री जनधन योजना में अब तक लगभग 57.11 करोड़ लाभार्थी जुड़ चुके हैं। इन खातों के माध्यम से बैंकिंग सुविधा, डेबिट कार्ड, बीमा, पेंशन और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर जैसी सुविधाएँ सीधे जनता तक पहुँची हैं। इससे बिचौलियों की भूमिका समाप्त हुई और पारदर्शिता बढ़ी।
प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के माध्यम से लगभग 10.33 करोड़ परिवारों को धुएँ से मुक्ति मिली और महिलाओं को सम्मानजनक जीवन का अवसर प्राप्त हुआ। यह योजना केवल ईंधन उपलब्ध कराने की नहीं, बल्कि महिलाओं के स्वास्थ्य, सम्मान और आत्मनिर्भरता से जुड़ी है।
आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत अब तक 40.45 करोड़ से अधिक आयुष्मान कार्ड जारी किए जा चुके हैं, जिनसे लगभग 14.69 करोड़ परिवारों को 5 लाख रुपये तक का कैशलेस इलाज उपलब्ध हो रहा है। यह योजना गरीब और वंचित वर्ग के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा की मजबूत ढाल बनकर उभरी है।
आत्मनिर्भर भारत और स्वदेशी चिंतन
एकात्म मानव दर्शन स्वदेशी और आत्मनिर्भरता पर विशेष बल देता है।
नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा प्रारंभ आत्मनिर्भर भारत अभियान इसी सोच का आधुनिक रूप है।
इसका उद्देश्य भारत को आर्थिक, औद्योगिक, तकनीकी और सामाजिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना है।
“वोकल फॉर लोकल” और “लोकल को ग्लोबल बनाना” केवल आर्थिक नारे नहीं हैं,
बल्कि राष्ट्रीय स्वाभिमान और सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक हैं।
आत्मनिर्भर भारत अभियान के पाँच आधार स्तंभ—
अर्थव्यवस्था,
अवसंरचना,
प्रणाली,
जनसांख्यिकी और
मांग—भारत को संतुलित विकास की दिशा में आगे ले जा रहे हैं।
पर्यावरण, संस्कृति और संतुलित विकास
प्रकृति और मानव के बीच संतुलन पर बल देता है, एकात्म मानव दर्शन
स्वच्छ भारत अभियान,
नमामि गंगे परियोजना,
नवीकरणीय ऊर्जा और
सौर ऊर्जा पर जोर इसी दृष्टिकोण को दर्शाता है।
काशी विश्वनाथ कॉरिडोर,
केदारनाथ पुनर्निर्माण,
सोमनाथ मंदिर विकास और राम मंदिर निर्माण जैसे कार्य भारत की सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण का प्रमाण हैं।
योग को वैश्विक पहचान और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भारतीय ज्ञान परंपरा पर दिया गया बल इसी दर्शन की अभिव्यक्ति है।
सुशासन और नैतिक राजनीति
पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने राजनीति को नैतिकता से जुड़ा कर्म माना था।
“न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन” की अवधारणा इसी सोच को दर्शाती है।
डिजिटल इंडिया,
ई-गवर्नेंस,
डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर और
अनावश्यक कानूनों का उन्मूलन शासन को अधिक पारदर्शी और जनोन्मुखी बनाता है।
निष्कर्ष
मोदी सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों में एकात्म मानव दर्शन की स्पष्ट झलक मिलती है।
चाहे अंत्योदय हो, आत्मनिर्भरता हो,
सांस्कृतिक पुनर्जागरण हो या संतुलित विकास—
इन सभी में पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचार साकार होते दिखाई देते हैं।
आज के वैश्वीकरण और उपभोक्तावाद के दौर में एकात्म मानव दर्शन भारत को उसकी जड़ों से जोड़ते हुए एक मानवीय, समरस और आत्मनिर्भर राष्ट्र बनने की दिशा प्रदान करता है।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय आज हमारे बीच नहीं हैं,
लेकिन उनके विचारों पर चलकर “अंत्योदय से राष्ट्रोदय” का संकल्प आज साकार होता दिखाई दे रहा है।



