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जनसामन्य के लिये महावीर के सिद्धात आज भी प्रासंगिक है

सिवनी 02 अप्रैल 2023
सिवनी यशो:-आज हमारे पास महावीर के शब्द तो है लेकिन महावीर का सत्य नहीं महावीर का आगम – तो है लेकिन महावीर का आचरण नहीं है, महावीर का चित्र तो है लेकिन महावीर का चरित्र नहीं हैं। महावीर का उपदेश तो है, लेकिन जानते तो हैं लेकिन सामना करना कठिन है। महावीर के संबंध में लोग बहुत कुछ जैसे- महावीर 24 वे तीर्थकर थे सिद्धार्थ के पुत्र थे, उनकी माता का नाम त्रिशला था कुंडलपुर ग्राम में जन्मे थे। राजकुमार थे, पावापुर से मुक्त हुये थे यह सब महावीर के संबंध में जानते है जो कि एकदम आसान है। जानते है भगवान महावीर को जानना संभव नही उन्हें तो सिर्फ जिया जा सकता है। महावीर को जानने का अर्थ है महावीर की अनुभूतियों से गुजर जाना, महावीर की भांति अनंत ऊचाईयों का स्पर्श कर लेना, महावीराय हो जाना, विना महावीराय हुए महावीर को जान पाना असंभव है।
महावीर को जानने वाला तो कोई आचरण का आचार्य ही हो सकते है, बातों का बादशाह नहीं, महावीर की विराट विरासत के मालिक वे है जो आचरणवान है, आचार्य है, सदगुरू हैं। पंडित महावीर को नहीं पा सकता है। विद्वान महावीर महावीर की अन्तरात्मा को नहीं जान सकता।
भगवान महावीर कहते है- प्रिय करने पर प्रिय करना यह सभी की प्रकृति है प्रिय न करने पर प्रिय करना, यह सन्तों की प्रकृति है। सन्त होना परन्तु मुश्किल है। कोई चोला बदलने मात्र से सन्त नहीं होता। महानता की कसौटी स्वयं जीवन जीते हुए औरो के आनंद के जीवन जीने में सहायक होता है, महान वही होता है जो औरो को जीने का अवसर प्रदान करता है, उन्हें उठने का चमकने का अवसर देता है, सूर्य और चन्द्रमा भूतल को ही प्रकाशित करते है, किन्तु दोनों में भारी अन्तर है। सारे ग्रह नक्षत्र और तारागण सौर परिवार के सदस्य है। फिर भी सूर्य उड़पति नहीं कहलाता क्योंकि वह अकेला चमकता है और जब चन्द्रमा उदित होता है तब अन्य को चमकने का भी अवसर देता है। उसकी यह उदारता ही उसे उपत्ति बना देती है। महान वहीं होता है जो अपने सम्पर्क में आने वाले प्रत्येक प्राणी को सुखद जीवन जीने का वरदान देता है। भ. महावीर ने कहा- जीवन में यदि कुछ मूल्यवान है तो वह है स्वयं का मूल्य । स्वयं के मूल्य से बढ़कर दुनिया में कोई मूल्यवान हो ही नहीं सकता, जो उसे पा लेता है वह सब कुछ पा लेता है। और जो उसे खो देता है वह सबकुछ खो देता है। जीवन की आत्म सम्पत्ति आत्मसम्पन्नता है।
भगवान महावीर के शब्दों में साधु साधनों से नहीं, साधना से होता है। भागने से नहीं भावना से होता है, उपकरण से नही आचरण से होता है। भगवान महावीर द्वारा प्रवर्तित धर्म पर विश्वशान्ति और आत्म कल्याण का अयोध उपक्रम है। विश्व में व्याप्त समस्याओं, विषमताओं, भय और त्रासदियों को अनेकान्त और अपरिग्रह के मार्ग पर चलकर ही दूर किया जा सकता है। देशकाल के अनुसार संदर्भ बदलते रहते हैं, पर इससे क्या होता है संदर्भ कितने ही बदल जाये लेकिन महावीर स्वामी के सिद्धान्त शाश्वत हैं वे आज भी उतने तरोताजा है जितने कि उनके जीवन काल में थे। भगवान महावीर के उद्देश्यों की आवश्यकता उपयोगिता जितनी उनके जीवनकाल में थी उससे भी कहीं अधिक आज है क्योंकि आज महाशक्तियों के पास समूची पृथ्वी का पन्द्रह बार विनाश कर सकें ऐसे करीब 60,000 हाईड्रोजन बम तैयार है। इन परमाणु शक्ति को अंहिसा के अमोध शस्त्र से ही दबाया जा सकता है। अहिंसा के द्वारा ही इन विस्फोटक पदार्थो पर काबू पाया जा सकता है, जब सारा विश्व विनाश की कगार पर खड़ा हो और चहुँ ओर हिंसक ज्वालाएं भड़क रही हों। ऐसे समय में अंहिंसा की पावन गंगोत्री में अवगार परम शीतलता प्रदान करता है।
जब तक इन बातों को अपने आन्तरिक जीवन में नहीं उतरेगें तब तक न हमारा उद्धार होगा, और न परिवार, समाज राष्ट्र का उद्धार होगा। आइये महावीर को जिह्वा से उत्तार कर जीवन में बसायें। महावीर के उपदेशों को जन जन में प्रचारित करने से पहले स्वयं के जीवन में उतार कर देखने की परम आवश्यकता है क्योंकि भगवन महावीर का धर्म वैयक्तिक जीवन से ही शुरू होता है।

Dainikyashonnati

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