मध्यप्रदेशछिंदवाड़ा

एक स्टे और सालों की मनमानी! अधिकारी-कर्मचारियों के कोर्ट मामलों पर सरकार की पैरवी सवालों में

स्थानांतरण और विभागीय कार्रवाई के मामलों में स्टे के बाद वर्षों तक नहीं हो पाता अंतिम फैसला, पेशी पर पेशी बढ़ने से प्रशासनिक कामकाज प्रभावित होने के आरोप

स्टे लेकर मनमानी करते अधिकारी-कर्मचारी? सालों से कोर्ट में अटके मामले

Chhindwara 13 August 2026
छिंदवाड़ा यशो:-  सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा न्यायालय से स्थगन (स्टे) हासिल करने के बाद वर्षों तक उसी स्थिति में बने रहने का मुद्दा अब प्रशासनिक व्यवस्था के लिए बड़ा सवाल बनता जा रहा है। स्थानांतरण, पदस्थापना और विभागीय कार्रवाई से जुड़े कई मामलों में न्यायालय से अंतरिम राहत मिलने के बाद लंबे समय तक अंतिम निर्णय नहीं हो पाने से शासन की कार्रवाई अधर में लटक जाती है।

मामले को लेकर सवाल यह भी उठ रहा है कि जब कोई अधिकारी या कर्मचारी शासन के आदेश के खिलाफ उच्च न्यायालय से स्थगन प्राप्त करता है, तो संबंधित विभाग द्वारा न्यायालय में कैविएट अथवा प्रभावी पैरवी की प्रक्रिया कितनी तत्परता से की जाती है। कई मामलों में यदि स्टे लंबे समय तक जारी रहता है तो संबंधित अधिकारी या कर्मचारी वर्षों तक उसी स्थिति में बना रहता है।

स्टे के बाद ‘पेशी पर पेशी’, कार्रवाई होती है बेअसर

प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा लंबे समय से है कि प्रदेश में स्थानांतरण एवं अन्य विभागीय मामलों से जुड़े सैकड़ों प्रकरण न्यायालयों में लंबित हो सकते हैं। इनमें कई मामलों में अंतरिम आदेश लंबे समय तक प्रभावी रहने के कारण शासन के मूल आदेशों का क्रियान्वयन नहीं हो पाता।

आलोचकों का कहना है कि ऐसी स्थिति में प्रशासनिक निर्णय लेने की प्रक्रिया प्रभावित होती है। वहीं, स्टे प्राप्त अधिकारी या कर्मचारी के संबंध में विभाग के सामने भी कानूनी सीमाएं खड़ी हो जाती हैं। परिणामस्वरूप एक ओर शासन का आदेश लंबित रहता है तो दूसरी ओर न्यायालयीन प्रक्रिया आगे बढ़ती रहती है।

सरकार की पैरवी पर भी उठ रहे सवाल

मामले में कर्मचारी संगठनों से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि अलग-अलग विभागों में लंबित ऐसे मामलों का व्यवस्थित आंकड़ा तैयार किया जाए और शासन स्तर पर उनकी प्रभावी पैरवी की रणनीति बनाई जाए, तो लंबे समय से लंबित प्रकरणों के निराकरण की दिशा में पहल हो सकती है।

कर्मचारी नेता का सुझाव है कि स्टे से जुड़े मामलों की विभागवार समीक्षा कर शासन को यह पता लगाना चाहिए कि कौन-से मामले कितने वर्षों से लंबित हैं और किन मामलों में विभाग की ओर से प्रभावी पैरवी की आवश्यकता है।

 ‘मैं तो कॉल सेंटर बन जाऊंगा’

स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी से जब न्यायालय से मिले स्टे और विभागीय स्तर पर उनके जवाब को लेकर सवाल किया गया तो उन्होंने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा—

“कोर्ट के इतने सारे स्टे हैं, यदि एक-एक का जवाब देता रहूंगा तो मैं कॉल सेंटर बन जाऊंगा।”

अधिकारी की यह टिप्पणी अपने आप में बताती है कि विभागों के सामने न्यायालयीन मामलों की निगरानी और समय पर पैरवी करना कितनी बड़ी चुनौती बन सकता है।

सवाल सिर्फ स्टे का नहीं, सिस्टम की जवाबदेही का है

न्यायालय से राहत मांगना हर अधिकारी-कर्मचारी का वैधानिक अधिकार है, लेकिन लंबे समय तक लंबित रहने वाले मामलों की प्रभावी पैरवी और शासन के आदेशों की स्थिति स्पष्ट कराने की जिम्मेदारी भी प्रशासन की है। जरूरत इस बात की है कि सरकार ऐसे मामलों की नियमित समीक्षा करे, लंबित प्रकरणों का रिकॉर्ड तैयार करे और जहां आवश्यक हो वहां समयबद्ध कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करे।

क्योंकि सवाल केवल इस बात का नहीं है कि किसे स्टे मिला—सवाल यह भी है कि स्टे के बाद शासन कितने समय तक इंतजार करता रहेगा और प्रशासनिक व्यवस्था कब तक असमंजस में रहेगी।

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