आदिवासी आजीविका पर संकट: छिंदवाड़ा में लघु वन उपज के पौधे हो रहे विलुप्त
लघु वन उपज संकट छिंदवाड़ा – आदिवासी आजीविका पर खतरा
Chhindwara 21 April 2026
छिंदवाड़ा यशो:- जिले सहित पांढुर्णा, बैतूल, बालाघाट और सिवनी जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्रों में लघु वन उपज (Non-Timber Forest Produce) देने वाले महत्वपूर्ण पौधे तेजी से विलुप्त होते जा रहे हैं। इसे लेकर पर्यावरण प्रेमियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने चिंता जताई है।
लघु वन उपज: करोड़ों लोगों की आजीविका
लघु वन उपज संकट छिंदवाड़ा – लघु वन उपज में फल, बीज, पत्ते, गोंद, लाख, शहद, औषधीय जड़ी-बूटियां और बाँस-बेंत शामिल हैं। यह असंगठित क्षेत्र देशभर में लगभग 3 करोड़ से अधिक लोगों की आय का प्रमुख स्रोत है, खासकर आदिवासी और वन आश्रित समुदायों के लिए।
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परंपरागत संसाधन अब हो रहे खत्म
महुआ, हर्रा, बहेरा, आंवला, करंज, इमली, जामुन, तेंदूपत्ता और साल के पत्ते जैसे उत्पाद न केवल खाद्य और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि इनका उपयोग औषधीय रूप में भी होता है।
इसके अलावा अश्वगंधा, गिलोय और अर्जुन की छाल जैसी जड़ी-बूटियां भी तेजी से कम होती जा रही हैं।
कानून और योजनाएं, फिर भी लघु वन उपज संकट छिंदवाड़ा
वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत आदिवासियों को लघु वन उपज पर अधिकार दिए गए हैं। वहीं सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) भी निर्धारित किया गया है, ताकि वन उपज का उचित मूल्य मिल सके। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर संसाधनों का क्षरण जारी है।
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संरक्षण के लिए उठी आवाज
पर्यावरण कार्यकर्ता रविंद्र सिंह (वृक्ष मित्र) ने चेतावनी दी है कि यदि इन प्रजातियों का संरक्षण नहीं किया गया तो आने वाले समय में आदिवासी आजीविका पर गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।
उन्होंने बड़े स्तर पर पौधारोपण और संरक्षण अभियान चलाने की अपील की है। इस अभियान में मास्टर ट्रेनर मोहन साहू ने भी सहयोग और जनजागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया।





