17 प्रतिशत का गणित और गुमशुदा टाइम कीपर!
नगर पालिका के निर्माण कार्यों में गुणवत्ता की तलाश, टाइम कीपर साहब अभी भी ‘लोकेशन आउट ऑफ कवरेज’
सिवनी नगर पालिका कमीशन – नगर पालिका में 17 प्रतिशत कमीशन की चर्चा, निर्माण कार्यों की निगरानी पर उठे सवाल
Seoni 25 May 2026
सिवनी यशो:- नगर पालिका परिषद सिवनी की हाल ही में हुई समीक्षा बैठक में विकास कार्यों की प्रगति, निर्माण कार्यों में हो रही देरी और गुणवत्ता को लेकर गंभीर चर्चा हुई।
बैठक में सिवनी विधायक दिनेश राय मुनमुन ने विभिन्न विकास कार्यों की समीक्षा करते हुए कुछ मामलों में नाराजगी भी व्यक्त की। इसी दौरान एक ऐसी चर्चा सामने आई जिसने नगर के राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी।
चर्चा यह रही कि किसी निर्माण कार्य का ठेका लेने के साथ ही कथित रूप से लगभग 17 प्रतिशत राशि “व्यवस्था शुल्क” के रूप में चली जाती है। इसके बाद कार्य के दौरान और अंतिम भुगतान के समय भी विभिन्न स्तरों पर लेन-देन की चर्चाएं होती हैं।
यदि इन चर्चाओं पर विश्वास किया जाए तो विकास कार्यों की बड़ी राशि रास्ते में ही “विकसित” हो जाती है और निर्माण स्थल तक पहुंचते-पहुंचते बजट का दम फूलने लगता है।
हालांकि इन आरोपों की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है, लेकिन जब सत्ता पक्ष के ही कुछ जनप्रतिनिधि सोशल मीडिया पर इस प्रकार की चर्चाओं का उल्लेख करने लगें, तो नगर में लोग कहने लगते हैं कि “धुआं वहीं उठता है, जहां कहीं न कहीं आग जरूर होती है।”
टाइम कीपर साहब का रहस्यमयी निरीक्षण
नगर पालिका के नियम कहते हैं कि निर्माण कार्यों की गुणवत्ता, माप और प्रगति की निगरानी के लिए इंजीनियरों और टाइम कीपर की नियमित उपस्थिति आवश्यक है। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी सुनाती है।
कई निर्माण स्थलों पर मजदूर रोज दिखाई देते हैं, मशीनें दिखाई देती हैं, ठेकेदार दिखाई देता है, यहां तक कि राह चलते नागरिक भी दिखाई देते हैं, लेकिन टाइम कीपर साहब के दर्शन दुर्लभ हो गए हैं।
स्थिति यह है कि कुछ लोगों का दावा है कि यदि किसी टाइम कीपर से पूछ लिया जाए कि नगर के किस वार्ड में कौन-सा निर्माण कार्य चल रहा है, तो पहले उन्हें गूगल मैप खोलना पड़ सकता है।
गुणवत्ता भगवान भरोसे, निरीक्षण कल्पना भरोसे
नियमों के अनुसार प्रत्येक निर्माण कार्य का समय-समय पर निरीक्षण होना चाहिए ताकि गुणवत्ता बनी रहे और सरकारी राशि का सही उपयोग सुनिश्चित हो सके। लेकिन यदि निरीक्षण ही नहीं होगा तो गुणवत्ता की जिम्मेदारी आखिर किसकी होगी?
नगर में कई लोग मजाक में कह रहे हैं कि शायद अब निर्माण कार्यों की निगरानी सीसीटीवी, ड्रोन या फिर भगवान भरोसे ही हो रही है, क्योंकि जिम्मेदार कर्मचारी तो शायद फाइलों में ही निरीक्षण कर रहे हैं।
17 प्रतिशत में टाइम कीपर का हिस्सा?
इस पूरे मामले में सबसे दिलचस्प टिप्पणी सत्ता पक्ष के ही एक पार्षद की सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर चर्चा में है।
पोस्ट में व्यंग्यात्मक अंदाज में लिखा गया कि शायद निर्माण कार्यों में चर्चित “17 प्रतिशत” के गणित में टाइम कीपर का हिस्सा तय नहीं है, इसलिए उन्हें निर्माण स्थलों तक जाने की प्रेरणा नहीं मिल पा रही।
व्यंग्य आगे कहता है—
“साहब, 17 प्रतिशत में थोड़ा हिस्सा टाइम कीपरों के लिए भी निर्धारित कर दीजिए, तब शायद वे भी साइट पर जाकर काम की गुणवत्ता की जांच करना शुरू कर दें।”
जनता का सवाल
नगरवासियों का कहना है कि यदि निर्माण कार्यों की नियमित निगरानी हो, गुणवत्ता की जांच हो और जिम्मेदारी तय हो, तो न तो कामों में अनावश्यक देरी होगी और न ही घटिया निर्माण को लेकर शिकायतें सामने आएंगी।
लेकिन फिलहाल नगर में चर्चा विकास कार्यों से ज्यादा उस “17 प्रतिशत” के गणित और गुमशुदा निरीक्षण व्यवस्था की हो रही है, जिसका जवाब शायद संबंधित विभाग ही बेहतर दे सकता है।
अस्वीकरण
यह लेख सार्वजनिक चर्चाओं, जनप्रतिनिधियों द्वारा सोशल मीडिया पर व्यक्त टिप्पणियों और स्थानीय स्तर पर चल रही चर्चाओं पर आधारित एक व्यंग्यात्मक प्रस्तुति है।
इसमें उल्लेखित कथित प्रतिशत, रिश्वत अथवा अनियमितताओं के आरोपों की स्वतंत्र एवं आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। संबंधित पक्षों का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।



