अंतिम व्यक्ति की चौखट तक पहुंचे स्वास्थ्य सुविधा, तभी सार्थक होगा विकास
दुर्गम गांवों और वनांचलों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच आज भी चुनौती; अस्पतालों के साथ डॉक्टर, दवा, जांच और एंबुलेंस की उपलब्धता जरूरी
अंतिम व्यक्ति तक स्वास्थ्य सुविधाएं क्यों नहीं पहुंच पा रहीं? |
हेमेन्द्र क्षीरसागर, पत्रकार, लेखक व स्तंभकार

बालाघाट यशो :- स्वास्थ्य किसी भी व्यक्ति के जीवन की पहली आवश्यकता और सभ्य समाज की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। विकास की चमक तभी सार्थक मानी जा सकती है, जब उसका लाभ समाज के उस अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे, जो भौगोलिक, आर्थिक अथवा सामाजिक कारणों से सुविधाओं से दूर है। दुर्भाग्य यह है कि आज भी देश के अनेक दूरस्थ ग्रामीण और वनांचल क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधा तक पहुंचना अपने आप में एक चुनौती बना हुआ है। ऐसे में सवाल केवल अस्पतालों की संख्या का नहीं, बल्कि यह है कि क्या हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था वास्तव में अंतिम व्यक्ति तक पहुंच रही है?
दूरी और संसाधनों की कमी बन रही बड़ी चुनौती
दुर्गम अंचलों में सामान्य बीमारी का समय पर उपचार नहीं मिल पाना कई बार गंभीर संकट का कारण बन जाता है। अस्पताल दूर हैं, परिवहन के साधन सीमित हैं, विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता कम है और कई स्थानों पर जांच तथा आवश्यक दवाइयों की सुविधा भी पर्याप्त नहीं है। सबसे अधिक परेशानी गर्भवती महिलाओं, नवजात शिशुओं, बुजुर्गों और गंभीर रोगियों को उठानी पड़ती है।

जिस बीमारी का उपचार गांव के नजदीक संभव हो सकता है, वही दूरी और देरी के कारण गंभीर रूप धारण कर लेती है। कई परिवारों के लिए समय पर अस्पताल पहुंचना आर्थिक बोझ के साथ-साथ जीवन-मृत्यु का प्रश्न भी बन जाता है।
भवन बनाने के साथ व्यवस्था मजबूत करना जरूरी
सरकारों द्वारा स्वास्थ्य संस्थानों के भवन बनाए जाना निश्चित रूप से स्वागतयोग्य है, लेकिन केवल भवन बना देने से स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत नहीं होती। अस्पताल में चिकित्सक, नर्सिंग स्टाफ, तकनीकी कर्मचारी, आवश्यक दवाइयां, जांच उपकरण और चौबीसों घंटे प्रभावी सेवाएं उपलब्ध होना भी उतना ही जरूरी है।
आपात स्थिति में मरीज को उच्च चिकित्सा केंद्र तक पहुंचाने के लिए पर्याप्त एंबुलेंस और बेहतर परिवहन व्यवस्था भी स्वास्थ्य तंत्र का अभिन्न हिस्सा होनी चाहिए। यदि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र मौजूद है, लेकिन वहां चिकित्सक या आवश्यक दवा उपलब्ध नहीं है, तो भवन की मौजूदगी मरीज के लिए पर्याप्त समाधान नहीं बन सकती।
मरीज अस्पताल तक नहीं, स्वास्थ्य सेवा मरीज तक पहुंचे
दूरस्थ क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए स्वास्थ्य सेवाओं का पारंपरिक मॉडल पर्याप्त नहीं होगा। मोबाइल मेडिकल यूनिट, टेलीमेडिसिन, नियमित स्वास्थ्य शिविर और गांव-स्तरीय प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता है।
स्थानीय युवाओं को प्रशिक्षित स्वास्थ्य कार्यकर्ता के रूप में तैयार किया जाए तो वे प्राथमिक उपचार, स्वास्थ्य जागरूकता और मरीजों को समय पर उचित चिकित्सा केंद्र तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
आज आवश्यकता इस सोच को बदलने की है कि मरीज अस्पताल तक पहुंचे। व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि स्वास्थ्य सेवा मरीज तक पहुंचे।
बीमारी के इलाज के साथ रोकथाम पर भी जोर
स्वास्थ्य व्यवस्था की सफलता केवल इलाज में नहीं, बल्कि बीमारी की रोकथाम में भी निहित है। कुपोषण, स्वच्छता, सुरक्षित पेयजल, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, टीकाकरण और संक्रामक रोगों के प्रति जागरूकता को दूरस्थ अंचलों की स्वास्थ्य नीति में प्राथमिकता देनी होगी।
स्थानीय भाषा और संस्कृति को समझते हुए चलाए जाने वाले जनजागरूकता अभियान अधिक प्रभावी साबित हो सकते हैं। जिस समुदाय की सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों को समझकर स्वास्थ्य संदेश दिया जाएगा, वहां उसका प्रभाव भी अधिक होगा।
स्वास्थ्य सेवा में संवेदनशीलता भी जरूरी
स्वास्थ्य सेवाओं में मानवीय संवेदनशीलता को सर्वोच्च महत्व देना होगा। दूरस्थ क्षेत्रों के नागरिकों को केवल मरीज नहीं, बल्कि सम्मान और अधिकार के साथ सेवा पाने वाला नागरिक समझना होगा।
उनकी भाषा, संस्कृति और जीवनशैली को समझने वाली स्वास्थ्य व्यवस्था ही लोगों में विश्वास पैदा कर सकती है। स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचने के बाद भी यदि मरीज को उपेक्षा, जानकारी के अभाव या अनावश्यक परेशानी का सामना करना पड़े, तो स्वास्थ्य व्यवस्था का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।
गांव की आखिरी बस्ती बने विकास की कसौटी
सवाल यह भी है कि जब हम विकास के बड़े-बड़े दावे करते हैं, तब क्या उस विकास की कसौटी गांव की आखिरी बस्ती और जंगल के बीच बसे उस परिवार को नहीं बनाया जाना चाहिए, जिसके लिए अस्पताल तक पहुंचना आज भी कठिन है?
किसी नागरिक का गांव शहर से जितना दूर हो सकता है, उसके अधिकार उतने दूर नहीं हो सकते। स्वास्थ्य, शिक्षा और न्याय जैसी मूलभूत सुविधाएं प्रत्येक नागरिक तक समान रूप से पहुंचना ही वास्तविक सामाजिक न्याय है।
तकनीक और स्थानीय सहभागिता से बदलेगी तस्वीर
दूरस्थ क्षेत्रों में टेलीमेडिसिन और डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी को कुछ हद तक दूर कर सकता है। मोबाइल स्वास्थ्य इकाइयां नियमित रूप से गांवों तक पहुंचें, प्राथमिक जांच वहीं हो और आवश्यकता पड़ने पर मरीज को उच्च चिकित्सा केंद्र तक पहुंचाने की व्यवस्था तत्काल उपलब्ध हो, तो कई गंभीर परिस्थितियों को समय रहते नियंत्रित किया जा सकता है।
इसके लिए तकनीक के साथ प्रशासनिक इच्छाशक्ति, पर्याप्त बजट, प्रशिक्षित मानव संसाधन और स्थानीय समुदाय की सहभागिता का समन्वय जरूरी है।
वास्तविक विकास वही, जो अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे
अंततः विकास का मूल्यांकन बड़े भवनों, योजनाओं और आंकड़ों से नहीं, बल्कि इस बात से होना चाहिए कि संकट की घड़ी में सबसे कमजोर और सबसे दूर खड़ा नागरिक कितनी जल्दी और कितनी गरिमा के साथ चिकित्सा सुविधा प्राप्त कर पाता है।
वास्तविक स्वास्थ्य व्यवस्था वही है, जिसकी पहुंच राजधानी से लेकर गांव की चौखट और गांव से आगे अंतिम व्यक्ति तक हो।
यदि किसी दूरस्थ गांव का नागरिक केवल दूरी के कारण समय पर इलाज से वंचित हो जाता है, तो यह केवल स्वास्थ्य व्यवस्था की कमी नहीं, बल्कि विकास के उस मॉडल पर भी सवाल है, जिसमें सुविधाएं केंद्र तक तो पहुंच गईं, लेकिन अंतिम व्यक्ति तक नहीं।
इसलिए अब आवश्यकता केवल नए अस्पताल बनाने की नहीं, बल्कि मौजूदा स्वास्थ्य तंत्र को मानव संसाधन, दवाइयों, जांच सुविधाओं, एंबुलेंस, तकनीक और संवेदनशील सेवा के साथ मजबूत करने की है। विकास की सबसे बड़ी सफलता तब होगी, जब देश के सबसे दूरस्थ गांव में रहने वाला व्यक्ति भी यह भरोसा कर सके कि बीमारी या आपात स्थिति में स्वास्थ्य व्यवस्था उसके साथ खड़ी है।
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