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बैगा अंचल में मौतों के बाद जागा प्रशासन, अब सवाल—जिम्मेदारी तय होगी या फिर राहत तक सिमटेगा पूरा अभियान?

दो दर्जन से अधिक मौतों के बाद घर-घर स्वास्थ्य जांच से फॉगिंग और स्वच्छता तक अभियान तेज, लेकिन बैगा जनजाति के नाम पर वर्षों से खर्च हुई भारी राशि का हिसाब और भ्रष्टाचार पर कार्रवाई भी जरूरी

बैगा अंचल में मौतों के बाद जागा प्रशासन, अब 20 साल के खर्च का हिसाब और जिम्मेदारी तय करने की मांग

bakaghat 22 August 2026
बालाघाट यशो:- बैगा जनजाति के संरक्षित अंचल में बीमारी से हुई दो दर्जन से अधिक मौतों ने स्वास्थ्य, पेयजल, स्वच्छता और सरकारी व्यवस्थाओं की गंभीर तस्वीर सामने ला दी है। मौतों के बाद प्रशासन अब प्रभावित गांवों में घर-घर स्वास्थ्य परीक्षण, मरीजों को अस्पताल पहुंचाने, फॉगिंग, कीटनाशक छिड़काव, जलस्रोतों की सफाई, आंगनबाड़ी केंद्रों में पोषण व्यवस्था और छात्रावासों में मच्छरदानियों की उपलब्धता जैसे कदम उठा रहा है। राहत और बचाव के ये प्रयास आवश्यक हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी अपनी जगह खड़ा है—इतनी मौतें होने तक व्यवस्था कहां थी और इसके लिए जिम्मेदार कौन है?

प्रभावित गांवों में अब तक 3,527 लोगों की घर-घर स्वास्थ्य जांच की जा चुकी है। इनमें 720 लोग विभिन्न बीमारियों से प्रभावित मिले, जबकि 213 मरीजों को बेहतर उपचार के लिए जिला अस्पताल भेजा गया और 507 मरीजों का घर पर उपचार किया गया। अस्पताल भेजे गए मरीजों में से बड़ी संख्या स्वस्थ होकर वापस लौट चुकी है, जबकि कुछ मरीज अभी उपचाररत हैं।

मौतों के बाद शुरू हुआ व्यापक अभियान

बीमारी की रोकथाम के लिए प्रभावित 19 गांवों के 2,343 घरों में इंडोर-आउटडोर फॉगिंग, लार्वा सर्वे और कीटनाशक छिड़काव किया गया है। जलस्रोतों के आसपास सफाई, गड्ढों की भराई, नालियों की सफाई और सड़क मार्गों की सफाई के साथ बीमारी की आशंका वाले 19 डार्क स्पॉट भी चिन्हित कर साफ किए गए हैं।

आंगनबाड़ी केंद्रों में बच्चों के लिए नियमित पोषण आहार की व्यवस्था की गई है। प्रभावित क्षेत्रों में 1,243 बच्चों तक भोजन पहुंचाया गया, जबकि जरूरतमंद महिलाओं और बच्चों को घर पहुंचकर भोजन तथा टेक होम राशन उपलब्ध कराया गया।

छात्रावासों और आश्रमों में भी सफाई, पानी की टंकियों की सफाई तथा मच्छरदानियों की उपलब्धता सुनिश्चित की जा रही है। पशुधन को भी अभियान से जोड़ा गया है और 276 पशुओं की जांच के साथ 251 पशुओं का टीकाकरण किया गया है।

राहत जरूरी, लेकिन मौतों की जिम्मेदारी तय करना उससे भी जरूरी

प्रशासन द्वारा शुरू किए गए ये प्रयास तत्काल राहत के लिए जरूरी हैं, लेकिन सवाल यह है कि इन व्यवस्थाओं की जरूरत मौतों के बाद ही क्यों महसूस हुई?

यदि किसी क्षेत्र में स्वास्थ्य, पेयजल, स्वच्छता और पोषण की नियमित निगरानी पहले से प्रभावी होती तो क्या स्थिति यहां तक पहुंचती? यदि बीमारी के कारण दो दर्जन से अधिक लोगों की जान गई है तो केवल वर्तमान में किए जा रहे राहत कार्य पर्याप्त नहीं माने जा सकते।

हर मौत की परिस्थितियों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यह स्पष्ट होना चाहिए कि बीमारी के कारण क्या थे, दूषित पानी या अन्य परिस्थितियों की क्या भूमिका रही, स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी थी और समय रहते आवश्यक कदम क्यों नहीं उठाए गए।

मौतों के बाद राहत पहुंचाना प्रशासन का दायित्व है, लेकिन मौतों के कारणों तक पहुंचना और जिम्मेदारी तय करना शासन की जवाबदेही है।

बैगा विकास के नाम पर वर्षों से खर्च का भी हो हिसाब

यह मामला इसलिए और गंभीर हो जाता है क्योंकि बैगा जनजाति संरक्षित जनजातीय समुदाय है और इसके संरक्षण, संवर्धन, स्वास्थ्य, आवास, शिक्षा, पोषण तथा मूलभूत सुविधाओं के नाम पर वर्षों से शासन की ओर से बड़ी धनराशि खर्च की जाती रही है।

यदि दशकों के सरकारी निवेश के बाद भी बैगा बहुल क्षेत्रों में लोगों को स्वास्थ्य, स्वच्छ पेयजल और बुनियादी स्वच्छता जैसी सुविधाओं के लिए ऐसी त्रासदी का सामना करना पड़ रहा है तो निश्चित रूप से योजनाओं के क्रियान्वयन और धन के उपयोग की समीक्षा आवश्यक है।

सरकार को केवल वर्तमान संकट का उपचार नहीं करना चाहिए, बल्कि पिछले कम से कम 20 वर्षों में बैगा जनजाति के संरक्षण और विकास के नाम पर स्वीकृत एवं खर्च की गई राशि का पूरा लेखा-जोखा सार्वजनिक करना चाहिए।

किस गांव में कितना पैसा गया?
किस योजना में कितना खर्च हुआ?
कितने मकान बने?
कितने परिवारों को लाभ मिला?
पेयजल और स्वास्थ्य के लिए कितना बजट आया?
और वास्तविक स्थिति आज क्या है?

इन सवालों का जवाब अब जनता को मिलना चाहिए।

आवास योजना में भ्रष्टाचार पर हाईकोर्ट की कार्रवाई भी सवाल खड़े करती है

बैगा परिवारों के आवास और विकास योजनाओं में पूर्व में सामने आए भ्रष्टाचार के मामले को भी इस पूरे घटनाक्रम से अलग करके नहीं देखा जा सकता। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के पूर्व आदेश में बैगा आवास से जुड़े कथित भ्रष्टाचार के मामले में तत्कालीन सहायक आयुक्त, आदिवासी विकास विभाग के विरुद्ध बर्खास्तगी, एफआईआर और राशि की वसूली जैसी कार्रवाई के निर्देश दिए गए थे।

यह न्यायिक कार्रवाई अपने आप में इस बात की गंभीरता को रेखांकित करती है कि बैगा जनजाति के नाम पर संचालित योजनाओं में यदि भ्रष्टाचार हुआ है तो उसका सीधा असर उस समुदाय तक पहुंचने वाली सुविधाओं पर पड़ता है।

इसलिए वर्तमान मौतों के बाद केवल बीमारी और पेयजल की जांच तक मामला सीमित नहीं रहना चाहिए। बैगा विकास योजनाओं में पूर्व में हुए भ्रष्टाचार और वर्तमान स्थिति के बीच भी प्रशासन को गंभीरता से पड़ताल करनी चाहिए।

‘जनविश्वास’ तभी बनेगा जब जमीन पर जवाब मिलेगा

इसी बीच प्रभावित क्षेत्र में प्रशासनिक स्तर पर शिकायतों के निराकरण और ग्रामीणों की समस्याएं सुनने का अभियान भी चल रहा है। ग्रामीणों की समस्याओं में राशन, पेंशन, स्वास्थ्य, सरकारी योजनाओं का लाभ और अन्य मूलभूत जरूरतें शामिल हैं।

लेकिन जनविश्वास केवल शिविर लगाने या आवेदन लेने से कायम नहीं होगा। जनविश्वास तब बनेगा, जब आवेदन का परिणाम जमीन पर दिखाई देगा।

इसी तरह स्वास्थ्य अभियान की सफलता भी केवल आंकड़ों से तय नहीं होगी। वास्तविक सफलता तब होगी जब प्रभावित गांवों में बीमारी की पुनरावृत्ति रुके, सुरक्षित पेयजल उपलब्ध हो, स्वच्छता की स्थायी व्यवस्था बने और लोगों को समय पर स्वास्थ्य सुविधा मिले।

विशेषज्ञों की चिकित्सा सुविधा और स्थायी स्वास्थ्य व्यवस्था जरूरी

बैगा बहुल क्षेत्रों में विशेषज्ञ चिकित्सकों के स्वास्थ्य शिविर, स्थायी एंबुलेंस, आवश्यकता वाले क्षेत्रों में एएनएम की पदस्थापना और नए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के प्रस्ताव जैसे कदम स्वागत योग्य हैं। लेकिन इन्हें तत्काल अभियान तक सीमित रखने के बजाय स्थायी स्वास्थ्य ढांचे में बदला जाना चाहिए।

बैगा परिवारों के स्वास्थ्य परीक्षण के साथ पोषण, रोजगार और आय के स्थायी साधनों पर भी काम करना होगा। प्रस्तावित बहुस्तरीय नर्सरी मॉडल, पशुपालन, उद्यानिकी और स्थानीय आजीविका के माध्यम से परिवारों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में ठोस कार्य आवश्यक है।

अब कार्रवाई केवल बीमारी पर नहीं, व्यवस्था की बीमारी पर भी हो

बैगा अंचल में हुई मौतें केवल एक स्वास्थ्य संकट नहीं हैं। यह स्वास्थ्य व्यवस्था, पेयजल, स्वच्छता, पोषण, प्रशासनिक निगरानी और योजनाओं के क्रियान्वयन की सामूहिक परीक्षा है।

मौतों के बाद फॉगिंग हो रही है, दवाएं पहुंच रही हैं, मरीज अस्पताल जा रहे हैं, सफाई हो रही है और भोजन बांटा जा रहा है—यह सब जरूरी है। लेकिन इसके साथ यह भी तय होना चाहिए कि इतनी बड़ी मानवीय त्रासदी की नौबत क्यों आई।

सरकार को चाहिए कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच कराए, प्रत्येक मौत का कारण स्पष्ट करे, जिम्मेदार अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका निर्धारित करे और जहां लापरवाही या भ्रष्टाचार प्रमाणित हो वहां कठोर दंडात्मक कार्रवाई करे।

बैगा जनजाति के नाम पर करोड़ों खर्च करने के बाद यदि आज भी उसके परिवार बीमारी, दूषित पानी और बुनियादी सुविधाओं के अभाव से जूझ रहे हैं तो केवल नई घोषणाएं पर्याप्त नहीं हैं। अब हिसाब चाहिए, जवाब चाहिए और जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

क्योंकि दो दर्जन से अधिक मौतों के बाद केवल राहत पहुंचाना पर्याप्त नहीं—मौतों के पीछे छिपी व्यवस्था की विफलता और भ्रष्टाचार तक पहुंचना भी उतना ही आवश्यक है।

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