एसएनसीयू में वॉर्मर में स्पार्किंग से तीन नवजात झुलसे, एक की मौत
छिंदवाड़ा मेडिकल कॉलेज में शिशु रोग विशेषज्ञ सर्जन की भर्ती अब तक क्यों नहीं? घटना ने सुरक्षा और विशेषज्ञ सेवाओं पर उठाए गंभीर सवाल
छिंदवाड़ा एसएनसीयू में वॉर्मर में स्पार्किंग से 3 नवजात झुलसे, 1 की मौत
Chhindwara 22 August 2026
छिंदवाड़ा यशो:- जिला अस्पताल की एसएनसीयू में वॉर्मर के हीटिंग यूनिट के फिलामेंट में स्पार्किंग के बाद लगी आग ने नवजातों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हादसे में एक ही वॉर्मर पर रखे तीन बच्चे झुलस गए, जिनमें से एक बच्ची की उपचार के दौरान मौत हो गई। घटना के बाद अस्पताल प्रबंधन ने तत्काल कार्रवाई करते हुए अन्य बच्चों को सुरक्षित स्थान पर शिफ्ट किया और झुलसे बच्चों को बेहतर उपचार के लिए जबलपुर रेफर किया।

घटना ने सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा किया है कि एसएनसीयू जैसी संवेदनशील इकाई में, जहां नवजातों की जिंदगी पूरी तरह चिकित्सकीय निगरानी और उपकरणों पर निर्भर रहती है, वॉर्मर में स्पार्किंग होने तक निगरानी व्यवस्था क्या कर रही थी? एसएनसीयू में पर्याप्त स्टाफ की मौजूदगी के बावजूद हादसा हुआ, ऐसे में घटना के तकनीकी और मानवीय दोनों पहलुओं की निष्पक्ष जांच जरूरी है।
वॉर्मर में स्पार्किंग, तीन नवजात झुलसे
सिविल सर्जन डॉ. कंचन दुबे के अनुसार बीती रात जिला अस्पताल के एसएनसीयू में वॉर्मर में स्पार्क होने के बाद आग लग गई। एक ही वॉर्मर पर रखे तीन बच्चे इसकी चपेट में आ गए। स्टाफ ने तत्काल तीनों बच्चों को बाहर निकाला। साथ ही एसएनसीयू में भर्ती अन्य करीब 30 बच्चों को भी तत्काल दूसरी यूनिट में शिफ्ट किया गया।
अस्पताल स्टाफ ने तत्काल आग पर काबू पाया, जिससे बड़ा हादसा टल गया। घटना की जानकारी मिलते ही आरएमओ, चाइल्ड स्पेशलिस्ट, डीन, मेडिकल सुपरिंटेंडेंट और अन्य विशेषज्ञ एसएनसीयू पहुंचे तथा बच्चों को आवश्यक प्राथमिक उपचार दिया गया।
मेडिकल कॉलेज के विशेषज्ञों ने किया उपचार, जबलपुर रेफर
घटना के बाद मेडिकल कॉलेज के सर्जिकल, नेत्र एवं ईएनटी विशेषज्ञों ने बच्चों का उपचार किया। इसके बाद जबलपुर मेडिकल कॉलेज के डीन से समन्वय कर तीनों बच्चों को सुपरस्पेशलिटी उपचार के लिए जबलपुर रेफर किया गया।
बताया गया है कि इनमें से खापाबिहारी चांद निवासी शिवानी पति आदित्य वर्मा की बच्ची पहले से ही गंभीर रूप से बीमार थी। झुलसने के बाद उसे उपचार के लिए जबलपुर भेजा गया, जहां उपचार के दौरान उसका दुखद निधन हो गया। अन्य दो बच्चों का उपचार जारी है।
घटना के बाद उठ रहा विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता का सवाल
हादसे ने छिंदवाड़ा मेडिकल कॉलेज में विशेषज्ञ चिकित्सकीय सेवाओं को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। मेडिकल कॉलेज में शिशु रोग विशेषज्ञों की उपलब्धता के बावजूद शिशु रोग सर्जन की नियुक्ति अब तक क्यों नहीं की गई? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नवजात एवं बच्चों के गंभीर मामलों में समय पर विशेषज्ञ उपचार बेहद महत्वपूर्ण होता है।
इस पूरे मामले में यह भी देखा जाना आवश्यक है कि मेडिकल कॉलेज में स्वीकृत पदों की स्थिति क्या है, किन विशेषज्ञ सेवाओं की आवश्यकता है और किन पदों पर अब तक भर्ती नहीं हो सकी है। यदि विशेषज्ञ चिकित्सक की कमी है तो उसके कारणों और जिम्मेदारी का भी परीक्षण होना चाहिए।
जबलपुर 230, नागपुर 125 किलोमीटर—इमरजेंसी रेफरल पर भी मंथन जरूरी
छिंदवाड़ा से जबलपुर की दूरी करीब 230 किलोमीटर, जबकि नागपुर करीब 125 किलोमीटर दूर है। ऐसे में गंभीर नवजातों और अन्य इमरजेंसी मरीजों के रेफरल के मामले में भौगोलिक दूरी, उपलब्ध सुपरस्पेशलिटी सेवाओं और मरीज की स्थिति के आधार पर सबसे तेज एवं उपयुक्त उपचार केंद्र का चयन किया जाना चाहिए।
विशेषकर नवजातों के मामले में समय अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। इसलिए रेफरल व्यवस्था को केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि मरीज की जान बचाने वाली त्वरित चिकित्सा व्यवस्था के रूप में विकसित किया जाना जरूरी है।
सांसद ने मुख्यमंत्री से जांच और कार्रवाई की मांग की
घटना के बाद सांसद बंटी विवेक साहू ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को पत्र भेजकर मामले की जांच कराने तथा दोषियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने मृत बच्ची के निधन पर दुख व्यक्त करते हुए कहा कि अन्य दोनों बच्चों के उपचार में किसी प्रकार की कमी नहीं आने दी जाएगी।
उन्होंने घटना के बाद नर्सिंग स्टाफ, चिकित्सकों एवं प्रशासन द्वारा तत्काल बच्चों को सुरक्षित निकालने और बेहतर उपचार के लिए जबलपुर रेफर किए जाने की कार्रवाई का भी उल्लेख किया।
कमलनाथ और नकुलनाथ ने भी जताया दुख
पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ एवं पूर्व सांसद नकुलनाथ ने भी जिला अस्पताल के एसएनसीयू में हुई घटना पर दुख व्यक्त किया। उन्होंने झुलसे नवजातों के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की तथा मृत बच्ची को श्रद्धांजलि दी।
अब केवल हादसा नहीं, जवाबदेही भी तय हो
एसएनसीयू में वॉर्मर जैसे जीवनरक्षक उपकरण में स्पार्किंग होना महज तकनीकी खराबी मानकर मामले को समाप्त नहीं किया जाना चाहिए। उपकरण का मेंटेनेंस कब हुआ, उसकी सुरक्षा जांच कब की गई, वॉर्मर में तकनीकी खराबी के संकेत पहले मिले थे या नहीं, उस समय ड्यूटी पर कौन-कौन था और आग लगने के बाद निर्धारित प्रोटोकॉल के तहत कितनी तेजी से कार्रवाई हुई—इन सभी बिंदुओं की जांच आवश्यक है।
साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि एक ही वॉर्मर पर तीन नवजातों को रखने की स्थिति क्यों बनी और एसएनसीयू में उपकरणों की सुरक्षा एवं नियमित निगरानी के लिए क्या व्यवस्था लागू है।
एक नवजात की मौत के बाद केवल राहत, रेफरल और जांच की घोषणा पर्याप्त नहीं होगी। इस घटना से जुड़ी प्रत्येक कड़ी की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए, ताकि भविष्य में किसी मासूम की जिंदगी किसी उपकरण की लापरवाही या व्यवस्था की कमी की कीमत न बने।
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