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32 बच्चों की मौत के बाद जागा स्वास्थ्य प्रशासन, लेकिन फर्जी डॉक्टर पर कार्रवाई अब तक क्यों नहीं?

फर्जी MBBS दस्तावेजों के सहारे 17 साल सरकारी नौकरी का आरोप, 2023 में BMO तक पहुंचा डॉक्टर; FIR के बावजूद गिरफ्तारी का इंतजार

फर्जी MBBS डिग्री पर 17 साल नौकरी, डॉक्टर की गिरफ्तारी नहीं

बालाघाट यशो :- आदिवासी बहुल बिरसा ब्लॉक में कथित फर्जी MBBS दस्तावेजों के आधार पर सरकारी नौकरी हासिल करने वाले डॉक्टर सुनील कुमार सिंह का मामला अब स्वास्थ्य व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। आरोप है कि डॉक्टर ने करीब 17 साल तक सरकारी सेवा की और वर्ष 2023 में ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर (BMO) के पद तक पहुंच गया। राज्य स्तरीय जांच में उसकी मेडिकल योग्यता को लेकर अनियमितताएं सामने आने के बाद एफआईआर दर्ज की गई, लेकिन अब तक गिरफ्तारी नहीं हुई है।

मामले ने उस समय और तूल पकड़ लिया है, जब बालाघाट में स्वास्थ्य संकट के बीच 32 बच्चों की मौतों की जानकारी सामने आई है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि स्वास्थ्य व्यवस्था में कथित फर्जीवाड़े का पता चलने के बाद भी कार्रवाई इतनी धीमी क्यों है?

17 साल तक सरकारी नौकरी, फिर BMO पद तक प्रमोशन

सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि डॉक्टर की MBBS योग्यता संदिग्ध या फर्जी दस्तावेजों पर आधारित थी, तो 17 वर्षों तक सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में उसका सत्यापन कैसे होता रहा?

इतना ही नहीं, वर्ष 2023 में उसे ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर जैसे महत्वपूर्ण पद की जिम्मेदारी भी मिली। इससे नियुक्ति के समय दस्तावेजों के सत्यापन से लेकर पदोन्नति की प्रक्रिया तक पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

राज्य स्तर की जांच के बाद एफआईआर तो दर्ज हो गई, लेकिन गिरफ्तारी नहीं होने से कार्रवाई की गंभीरता पर सवाल उठ रहे हैं।

32 बच्चों की मौत ने बढ़ाई चिंता

बालाघाट जिले में सामने आए मौजूदा स्वास्थ्य संकट के दौरान आधिकारिक रूप से 32 बच्चों की मौत होने की जानकारी सामने आई है। इनमें से कम से कम सात मौतें उस अवधि में हुईं, जब आरोपी डॉक्टर जून में छुट्टी पर जाने से पहले तक क्षेत्र में तैनात था।

बिरसा से हटाए जाने के बाद डॉक्टर की तैनाती दमोह प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र क्षेत्र में भी रही, जहां दो बच्चों की मौत की जानकारी सामने आई है।

हालांकि, यह बेहद महत्वपूर्ण है कि अधिकारियों के अनुसार फिलहाल ऐसा कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य सामने नहीं आया है, जिससे डॉक्टर को इन बच्चों की मौतों के लिए सीधे जिम्मेदार ठहराया जा सके। इसलिए मौतों और डॉक्टर के खिलाफ फर्जी डिग्री के आरोप—दोनों मामलों को अलग-अलग जांच के दायरे में देखना जरूरी है।

टीकाकरण के 75 प्रतिशत आंकड़े भी सवालों के घेरे में

मामले का एक और पहलू क्षेत्र में खसरा टीकाकरण से जुड़ा है। बताया गया कि आरोपी डॉक्टर के कार्यकाल के दौरान क्षेत्र में करीब 75 प्रतिशत टीकाकरण कवरेज की जानकारी दी गई थी।

अब स्वास्थ्य विभाग प्रभावित गांवों में नए सिरे से टीकाकरण अभियान चला रहा है। खसरा भी बच्चों की मौत के पीछे सामने आए कारणों में शामिल बताया जा रहा है। ऐसे में पुराने टीकाकरण आंकड़ों की विश्वसनीयता और जमीनी स्थिति को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।

CMHO बोले—75 प्रतिशत टीकाकरण की दी गई थी जानकारी

बालाघाट के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. शत्रुघ्न सिंह दहिया ने बताया कि आरोपी डॉक्टर के कार्यकाल में 75 प्रतिशत टीकाकरण की जानकारी दी गई थी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि SAM से पीड़ित बच्चों में कई बार टीका अपेक्षित प्रभाव नहीं दिखा पाता, इसलिए खसरे के मामले सामने आने मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि क्षेत्र में पहले टीकाकरण हुआ ही नहीं था।

अब जांच के साथ जवाबदेही भी जरूरी

पूरा मामला अब सिर्फ एक डॉक्टर की कथित फर्जी डिग्री तक सीमित नहीं रह गया है। यदि दस्तावेज फर्जी पाए गए हैं, तो यह भी जांच का विषय है कि नियुक्ति के समय सत्यापन किसने किया, 17 साल तक विभागीय निगरानी कैसे हुई और BMO पद तक पहुंचने से पहले दस्तावेजों की दोबारा जांच क्यों नहीं हुई?

दूसरी ओर, 32 बच्चों की मौत के बाद स्वास्थ्य विभाग द्वारा प्रभावित क्षेत्रों में निगरानी और टीकाकरण अभियान तेज किया जाना जरूरी कदम है। लेकिन एफआईआर के बावजूद आरोपी डॉक्टर की गिरफ्तारी नहीं होने से कार्रवाई पर सवाल कायम हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—

क्या स्वास्थ्य प्रशासन केवल बीमारी और मौतों के बाद सक्रिय होगा, या व्यवस्था में इतनी बड़ी चूक के लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही भी तय होगी?

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