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पंचायत विभाग में भ्रष्टाचार की परतें फिर चर्चा में, लोकायुक्त की कार्रवाई ने खड़े किए कई सवाल

Dainik Yashonnati

Dainik Yashonnati / Aug 08, 2026 05:09 pm / Post views : 243

पंचायत विभाग में भ्रष्टाचार की परतें फिर चर्चा में, लोकायुक्त की कार्रवाई ने खड़े किए कई सवाल
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Lokayukta Raid MP: सिवनी में पदस्थ पंचायत विभाग के बाबू के 5 ठिकानों पर छापा, आय से 543% अधिक संपत्ति का दावा

Seoni 08 August 2026 सिवनी/जबलपुर यशो :- पंचायत विभाग में भ्रष्टाचार और सरकारी योजनाओं की राशि के कथित दुरुपयोग को लेकर शिकायतें और चर्चाएं नई नहीं हैं। ग्रामीण विकास और पंचायतों के माध्यम से जनता तक पहुंचने वाली योजनाओं में गड़बड़ी के आरोप समय-समय पर सामने आते रहे हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इन शिकायतों पर विभागीय स्तर पर होने वाली जांच आखिर कितनी प्रभावी होती है? अक्सर शिकायतों के बाद जांच शुरू होती है, फाइलें बनती हैं, रिपोर्ट तैयार होती है और मामला कार्रवाई की प्रक्रिया में आगे बढ़ने के बजाय कागजों के ढेर में दबकर रह जाता है। ऐसे में अब लोकायुक्त की ताजा कार्रवाई ने पंचायत विभाग की कार्यप्रणाली और लंबे समय से लंबित शिकायतों को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं।

एक कार्रवाई ने खोल दी संपत्ति की कहानी

सिवनी में पदस्थ पंचायत विभाग के सहायक ग्रेड-2 सुभाष शर्मा के जबलपुर और सिवनी से जुड़े पांच ठिकानों पर लोकायुक्त की कार्रवाई में प्रारंभिक तौर पर ज्ञात आय की तुलना में 543.19 प्रतिशत अधिक संपत्ति/व्यय पाए जाने का दावा किया गया है। लोकायुक्त की टीम फिलहाल दस्तावेजों, जमीन-जायदाद और अन्य रिकॉर्ड की जांच कर रही है। जांच पूरी होने के बाद ही संपत्ति और आय का वास्तविक आंकड़ा सामने आएगा। लेकिन इस कार्रवाई ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि यदि एक कर्मचारी के मामले में आय और संपत्ति के बीच इतना बड़ा अंतर सामने आने का दावा किया जा रहा है, तो विभागीय निगरानी व्यवस्था आखिर कहां थी?

योजनाओं की राशि और जमीनी हकीकत के बीच अंतर क्यों?

पंचायत विभाग के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क, नाली, आवास, जल व्यवस्था, स्वच्छता, रोजगार और अन्य विकास योजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य ग्रामीणों को सुविधाएं उपलब्ध कराना है। इसके बावजूद कई बार ग्रामीण क्षेत्रों से काम की गुणवत्ता, भुगतान, निर्माण कार्यों और योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर शिकायतें सामने आती रही हैं। सवाल यह है कि क्या हर शिकायत की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच होती है या फिर कई मामले जांच की प्रक्रिया में ही उलझकर रह जाते हैं?

'छोटी मछली' या बड़े नेटवर्क तक पहुंचने का रास्ता?

लोकायुक्त की कार्रवाई के बाद अब चर्चाओं का केंद्र सिर्फ एक कर्मचारी तक सीमित नहीं है। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या यह मामला केवल एक व्यक्ति की कथित अनुपातहीन संपत्ति तक सीमित है या इसके पीछे किसी बड़े नेटवर्क और संरक्षण की भी पड़ताल होगी? यदि जांच में आरोप सही साबित होते हैं तो यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि इतनी संपत्ति अर्जित करने के दौरान संबंधित कर्मचारी की संपत्तियों और आर्थिक गतिविधियों पर विभागीय स्तर पर कभी सवाल क्यों नहीं उठे। एक 'छोटी मछली' पर कार्रवाई से आगे बढ़कर यदि जांच बड़े नेटवर्क तक पहुंचती है, तभी पंचायत विभाग में भ्रष्टाचार की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकेगी।

विभागीय जांचों की निष्पक्षता भी जांच के दायरे में हो

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल विभागीय जांच व्यवस्था को लेकर है। यदि भ्रष्टाचार की शिकायतों पर समय रहते प्रभावी कार्रवाई हो, तो किसी मामले को लोकायुक्त या अन्य जांच एजेंसी तक पहुंचने की नौबत ही क्यों आए? अब जरूरत केवल संपत्ति की जांच तक सीमित रहने की नहीं, बल्कि यह पता लगाने की भी है कि पूर्व में संबंधित अधिकारी-कर्मचारी के खिलाफ कितनी शिकायतें हुईं, उन पर क्या जांच हुई और उन जांचों का परिणाम क्या रहा। लोकायुक्त की कार्रवाई अभी जारी है। इसलिए अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगा, लेकिन इस कार्रवाई ने पंचायत विभाग की निगरानी, जवाबदेही और विभागीय जांच व्यवस्था पर गंभीर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।
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