अपशब्द या गाली वाणी का अपाहिज रूप हैं। यह बोलने वाले के व्यक्तित्व का वो हिस्सा होता हैं, जो विकृत होकर प्रकट हो रहा हैं।
प्रेम से बोलो तो यही शब्द फूल हैं वरना शूल।
इन दिनों सोशल मीडिया पर, खासकर ओटीटी पर अधिकांश कार्यक्रमों में अपशब्दों का बेतहाशा प्रयोग हो रहा हैं। रियल लाइफ के नाम पर रील लाइफ में कुछ कलाकार शब्दों का चीरहरण कर रहे हैं।
जब भी कोई मनुष्य अपशब्द बोलता हैं, तो पहले उसके भीतर का पशु अंगड़ाई लेता हैं। आप बिना पशुवत हुए गाली दे ही नहीं सकते। जब कोई गाली दे रहा होता हैं, तब वह घोषणा करता हैं कि हम हैं तो इंसान, पर मनुष्य के साथ ही पशु बनने जा रहे हैं। फिल्मों और सीरियल के कला पक्ष को गाली का सहारा देकर कला कला को विकृत किया जा रहा हैं।
अब आप परिवार के साथ बैठकर कोई फिल्म या सीरियल निश्चित होकर नहीं देख सकते। अश्लीलता का, अपशब्दों का दृश्य कभी भी प्रवेश कर सकता हैं।
पर्दा टी वी का हो या मोबाईल का, नाग के फन में बदल गया हैं। जो काट तो नहीं रहा, मगर जहर फूँक रहा हैं।



