वर्तमान में नई तकनीकों ने हमारे कार्यों की गति बढ़ा दी है। इसके साथ ही तुरन्त परिणाम प्राप्त करने का चस्का भी तेजी से बढ़ा है। लेकिन जब हम अपने हिस्से का कार्य कर लेते हैं, तो उसके बाद भी हमें उसका परिणाम पाने के लिए इन्तजार करना पड़ता है।
धैर्य में हमें उचित समय की प्रतीक्षा करनी पड़ती है, लेकिन यह जरूरी नहीं कि प्रतीक्षा के समय कुछ कार्य न किए जाएँ। यदि प्रतीक्षा का समय यूँ ही गँवाया जाएगा, तो व्यर्थ समय गुजरने के कारण बेचैनी और झुँझलाहट का होना स्वाभाविक है।
कहते हैं कि गड़बड़ी की शुरुआत हड़बड़ी से होती है। व्यक्ति जैसा ही धैर्य खोता है, वह एक तरह से सफलता की सम्भावना को नकार बैठता है। धैर्य न कर पाने के कारण कई बार व्यक्ति के कदम गलत दिशा में मुड़ जाते हैं।
यह सच है कि धीरज के साथ किये गए कार्य सफलता की गाॅरण्टी नहीं देते, लेकिन इस बात की गाॅरण्टी जरूर देते हैं कि असफलता से पार जाने के दूसरे रास्ते उपलब्ध हो जायें।
कुछ लोग यह सोचते हैं कि धैर्य का मतलब धीमा कार्य करना होता है, सत्य ऐसा नहीं है। व्यक्ति जब किसी कार्य को हड़बड़ी में करने का प्रयत्न करता है, तो वह सत्य एवं वास्तविकता को अनुभव नहीं कर पाता है और बेचैनी में किये गए कार्यों के कारण कई बार उसे निराशा का भी सामना करना पड़ता है। इस दौरान वह ऐसी बातें बोल बैठता है, जो उसे नहीं बोलना चाहिए और ऐसे कार्य भी कर बैठता है, जो उसे नहीं करना चाहिए।
धैर्यवान होना एक अच्छा गुण है, लेकिन धैर्य रख पाना सबके लिए सम्भव नहीं हो पाता है। धैर्य प्रतीक्षा करने की कला है। जो सीमा धैर्य की होती है, वही हमारी उम्मीदों की भी होती है। धैर्य रखना केवल अच्छे गुण ही नहीं है बल्कि यह कौशल भी है।
धैर्य को इंग्लिश में “पेशेंस” कहते हैं, जिसका अर्थ है- बिना आपा या आस खोये, देरी, मुसीबत और झुँझलाहट के क्षणों को स्वीकारने या सहन करने की क्षमता।
जीवन में चाहे किसी भी तरह की परेशानी हो, उसे आसानी से पार किया जा सकता है, बशर्ते व्यक्ति में हड़बड़ी न हो और वह ठहर कर परिस्थितियों पर चिन्तन कर सकता हो।
धैर्य के अवसर पर व्यक्ति को वह सब कार्य यथावत करते रहने चाहिए, जिन्हें वह कर सकता है और इससे प्रतीक्षा की अवधि भी सहजता से गुजर जाती है। धैर्य व्यक्ति को वह सब कुछ प्रदान करता है, जिसका वह सही मायने में हकदार है।



