आदमी की नब्बे प्रतिशत मुसीबतें वह जो व्यर्थ की बातें कर लेता है, उससे निकलती हैं। किसी से कुछ कह दिया, फिर उसने कुछ कह दिया, फिर सिलसिला जारी है, फिर उसका अंत नहीं होता।
व्यर्थ की बातें हम सुनते हैं। अगर एक आदमी मुझसे आकर कहता है कि फलां आदमी ने आप
को गाली दी, तो मैं एकदम पूरी आत्मा को जगाकर सुनने लगता हूं। क्या जरूरत थी? गाली ही दी थी न। तो उससे कहना था कि आपने सुन लिया यह भी बुरा किया। आपको उसी वक्त कान बंद कर लेने थे। क्योंकि गाली को भीतर क्यों जाने देना और आप मुझे किसलिए सुनाने चले आए हो? आप पर किसी ने कचरा फेंक दिया, अब आप मुझे और क्यों फेंक रहे हो उस पर! आपही समझो। हो गयी बात, समाप्त हो गयी। व्यर्थ सुनकर हम भीतर, फिर काम भी तो करना पड़ेगा। एक किसी ने गाली दी है, उसको सुन लेने से तो निपटारा नहीं होता। फिर भीतर सिलसिला चलता है। फिर शक्ति व्यय होती है और हम चौबीस घंटे अपनी शक्ति को इसी तरह व्यर्थ करते हैं।
को गाली दी, तो मैं एकदम पूरी आत्मा को जगाकर सुनने लगता हूं। क्या जरूरत थी? गाली ही दी थी न। तो उससे कहना था कि आपने सुन लिया यह भी बुरा किया। आपको उसी वक्त कान बंद कर लेने थे। क्योंकि गाली को भीतर क्यों जाने देना और आप मुझे किसलिए सुनाने चले आए हो? आप पर किसी ने कचरा फेंक दिया, अब आप मुझे और क्यों फेंक रहे हो उस पर! आपही समझो। हो गयी बात, समाप्त हो गयी। व्यर्थ सुनकर हम भीतर, फिर काम भी तो करना पड़ेगा। एक किसी ने गाली दी है, उसको सुन लेने से तो निपटारा नहीं होता। फिर भीतर सिलसिला चलता है। फिर शक्ति व्यय होती है और हम चौबीस घंटे अपनी शक्ति को इसी तरह व्यर्थ करते हैं।



