मध्यप्रदेशछिंदवाड़ा

बीईओ मामला: कार्रवाई तय थी, फोन आया और सब बदल गया

छिंदवाड़ा जिले के हरई ब्लॉक में बीईओ प्रकाश कालंबे पर लगे गंभीर भ्रष्टाचार के आरोपों पर कार्रवाई एक फोन कॉल के बाद थमती दिखी। शिक्षक आंदोलन, तैयार आदेश और फिर अचानक यू-टर्न ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

छिंदवाड़ा हर्रई यशो:- हर्रई ब्लॉक में सामने आया बीईओ प्रकरण अब केवल एक अधिकारी को बचाने का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह नेता-नगरी, अफसरशाही और भ्रष्टाचार के संभावित गठजोड़ की स्पष्ट तस्वीर पेश कर रहा है।
जिस मामले में सैकड़ों शिक्षक सड़कों पर उतरे, नारेबाजी हुई, ज्ञापन सौंपे गए और विभागीय कार्रवाई लगभग तय मानी जा रही थी—वही मामला एक फोन कॉल के बाद अचानक ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

हटाने का आदेश तैयार… फिर अचानक यू-टर्न

विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, बीईओ प्रकाश कालंबे के खिलाफ विरोध इतना व्यापक था कि उन्हें पद से हटाने हेतु आदेश का ड्राफ्ट तक तैयार कर लिया गया था। शिक्षा विभाग के भीतर स्पष्ट संकेत थे कि अब कार्रवाई होकर रहेगी।

लेकिन तभी हरई ब्लॉक के एक प्रभावशाली “नेता जी” सक्रिय हुए।

इसके बाद—
हटाने की प्रक्रिया रोक दी गई
आदेश फाइलों में दबा दिया गया
और मामला सिमटकर केवल एक औपचारिक नोटिस तक रह गया

 सवाल उठता है—

क्या सैकड़ों शिक्षकों की आवाज़ एक फोन कॉल से छोटी पड़ गई?

 करोड़ों का भ्रष्टाचार, फिर भी मेहरबानी?

शिक्षकों और विभागीय सूत्रों का दावा है कि बीईओ के कार्यकाल में—

विकास कार्यों में भारी वित्तीय अनियमितताएं
शैक्षणिक योजनाओं में फर्जीवाड़ा
भुगतान, निर्माण और व्यवस्थाओं में बंदरबांट
जैसे गंभीर आरोप सामने आए हैं।

यह मामला लाखों नहीं, सीधे-सीधे करोड़ों रुपये के घोटाले से जुड़ा बताया जा रहा है।

इसके बावजूद, जांच आगे बढ़ने के बजाय कागजी खानापूर्ति तक सीमित होती नजर आ रही है।

 जनजाति आयुक्त की भूमिका भी सवालों में

इस पूरे प्रकरण में जनजाति आयुक्त सत्येंद्र मरकाम की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार—

प्रशासनिक संरक्षण
कार्रवाई से बचाने की कोशिश
समय निकालने की रणनीति
यहीं से मिलती दिखाई दे रही है।
अब सवाल यह है—

अगर अधिकारी निर्दोष हैं तो निष्पक्ष जांच से डर क्यों?
और अगर दोषी हैं तो उन्हें बचा कौन रहा है?

 नियम सिर्फ कमजोरों के लिए?

यह पूरा मामला एक कड़वा सच उजागर करता है—

आम कर्मचारी पर मामूली आरोप में निलंबन
लेकिन “पावर” वाले अफसर पर करोड़ों के आरोप, फिर भी संरक्षण

शिक्षक सवाल कर रहे हैं—

“जब हम सड़कों पर उतरे, तब सिर्फ आश्वासन मिला।

लेकिन जब नेता जी ने फोन किया,

तब सिस्टम तुरंत हरकत में आ गया।”

अब यह सिर्फ शिक्षा का मामला नहीं

अब यह लड़ाई— ✔ ईमानदार बनाम भ्रष्ट
✔ जनता बनाम सत्ता
✔ नियम बनाम सिफारिश
अगर आज यह मामला दबा, तो कल पूरा जिला इसी दलदल में फंसा नजर आएगा।

 शिक्षकों और जनता की स्पष्ट मांग

बीईओ प्रकाश कालंबे के खिलाफ उच्चस्तरीय स्वतंत्र जांच
फोन कॉल व दबाव डालने वालों की जांच व जवाबदेही
जनजाति आयुक्त की भूमिका पर स्पष्टीकरण
दोष सिद्ध होने पर तत्काल निलंबन व कानूनी कार्रवाई

जब एक फोन कानून से बड़ा हो जाए,

जब करोड़ों के आरोप नोटिस में बदल जाएं—

तो यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, सिस्टम की हार है।

यह रिपोर्ट जनहित और सच्चाई के पक्ष में है।

सवाल उठते रहेंगे… क्योंकि चुप्पी भी अपराध है।

Dainikyashonnati

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