प्रबल पंच के साथ क्रीड़ा करते हैं भगवान् शंकर : ब्रह्मचारी श्री निर्विकल्प स्वरूप जी
शिव महापुराण कथा के द्वितीय दिवस पंचानन स्वरूप, आत्मतत्त्व और मोक्ष के रहस्यों का दिव्य निरूपण, हर-हर महादेव के जयघोष से गूंजा कथा पंडाल
शिव महापुराण कथा सिवनी: प्रबल पंच के साथ क्रीड़ा करते हैं भगवान् शंकर – ब्रह्मचारी निर्विकल्प स्वरूप जी
सिवनी यशो :- श्रावण मास की पावन बेला में जिला अस्पताल के सामने स्थित स्मृति लॉन इन दिनों शिवभक्ति, वैदिक मंत्रोच्चार और हर-हर महादेव के गगनभेदी जयघोष से गुंजायमान है। विशाल एवं भव्य वाटरप्रूफ पंडाल में आयोजित श्री शिव महापुराण कथा के द्वितीय दिवस श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी।

कथा व्यास पूज्य ब्रह्मचारी श्री निर्विकल्प स्वरूप जी महाराज ने भगवान् शिव के पंचानन स्वरूप, आत्मतत्त्व और मोक्ष के रहस्यों का ऐसा दिव्य एवं ओजस्वी निरूपण किया कि संपूर्ण वातावरण शिवमय हो उठा। कथा के दौरान श्रद्धालु भक्ति रस में सराबोर होकर बार-बार “हर-हर महादेव” और “बोल बम” के जयघोष करते रहे।
शिव ही हैं परम मंगलस्वरूप
ब्रह्मचारी श्री निर्विकल्प स्वरूप जी महाराज ने कहा कि भगवान् शिव आद्यन्त मंगलस्वरूप हैं। उनका आदि भी मंगलमय है, मध्य भी मंगलमय है और अंत भी केवल कल्याणकारी है। संसार में अनेक व्यक्तियों का प्रारंभ अच्छा होता है तो अंत नहीं, और किसी का अंत श्रेष्ठ होता है तो प्रारंभ नहीं, किंतु भगवान् शिव ऐसे परम देव हैं जो प्रत्येक काल, प्रत्येक अवस्था और प्रत्येक परिस्थिति में जीवों का कल्याण ही करते हैं। इसी कारण उन्हें जगत का परम मंगलस्वरूप कहा गया है।
शिव प्रत्येक जीव के हृदय में आत्मा के रूप में विराजमान हैं
उन्होंने कहा कि भगवान् शिव के समान कोई नहीं है। जब समान कोई नहीं, तो उनसे श्रेष्ठ भी कोई नहीं हो सकता। शिव केवल कैलाश पर विराजमान देव नहीं, बल्कि प्रत्येक जीव के हृदय में आत्मा के रूप में विद्यमान परम चेतना हैं। जब मनुष्य अपने भीतर स्थित शिवतत्त्व का साक्षात्कार कर लेता है, तभी उसके जीवन का वास्तविक कल्याण प्रारंभ होता है।
प्रबल पंच के साथ क्रीड़ा करते हैं भगवान् शंकर
कथा के दौरान ब्रह्मचारी जी ने भगवान् शिव के पंचानन स्वरूप की विस्तृत व्याख्या करते हुए कहा कि भगवान् शंकर प्रबल पंच के साथ क्रीड़ा करते हैं। यह प्रबल पंच है—उत्पत्ति, स्थिति, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह।
उन्होंने बताया कि तिरोभाव का अर्थ केवल शरीर का अंत नहीं, बल्कि जीव का इस देह से प्रस्थान है, जबकि अनुग्रह भगवान् की वह सर्वोच्च कृपा है जिसके फलस्वरूप जीव को मोक्ष एवं परम मुक्ति की प्राप्ति होती है। भगवान् शिव अपने पाँच मुखों के माध्यम से इन पाँचों दिव्य कृत्यों का संचालन कर संपूर्ण सृष्टि का संतुलन बनाए रखते हैं।
मंगलाचरण से दूर होती हैं समस्त विघ्न-बाधाएँ
ब्रह्मचारी श्री निर्विकल्प स्वरूप जी ने कहा कि महर्षि वेदव्यास ने प्रत्येक शुभ कार्य से पूर्व मंगलाचरण का विधान केवल परंपरा निभाने के लिए नहीं किया, बल्कि इसलिए कि ईश्वर एवं अपने इष्टदेव के स्मरण से समस्त विघ्न-बाधाएँ स्वतः समाप्त हो जाती हैं। जब जीवन का प्रत्येक कार्य भगवान् के नाम से प्रारंभ होता है, तब वह कार्य सफल, मंगलमय और आनंददायक बन जाता है।
शिवमय बना स्मृति लॉन, उमड़ा आस्था का सैलाब
कथा के दौरान भगवान् शिव की महिमा का श्रवण करते हुए अनेक श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे। भजनों, शिवनाम संकीर्तन और हर-हर महादेव के जयघोष से पूरा कथा पंडाल भक्तिरस में डूबा रहा। कथा के समापन पर श्रद्धालुओं ने भगवान् शिव की आरती में सहभागिता कर विश्व शांति, राष्ट्र के कल्याण, परिवार की सुख-समृद्धि एवं आध्यात्मिक उन्नति की कामना की।
आयोजन समिति ने बताया कि श्री शिव महापुराण कथा प्रतिदिन जिला अस्पताल के सामने स्थित स्मृति लॉन में आयोजित की जा रही है। सभी धर्मप्रेमी श्रद्धालुओं से सपरिवार उपस्थित होकर शिवमहापुराण के दिव्य प्रसंगों का श्रवण कर भगवान् आशुतोष की कृपा प्राप्त करने का आग्रह किया गया है।



