धर्मसिवनी

हमारा सहज स्वरूप परामात्मा से भिन्न नहीं है – निर्विंकल्प स्वरूप जी

देवताओं को इंद्रियों का दमन, दानव को कूरता से दया

हमारा सहज स्वरूप परामात्मा से भिन्न नहीं है - निर्विंकल्प स्वरूप जी - Seoni News
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सिवनी यशो:- देवताओं को इंद्रियों का दमन, दानव को कूरता से दया और मानव को दान देना चाहिए यह उपदेश ब्रह्मा जी ने दिया था, दान से धन की शुद्धि होती है, धन की तीन ही गति होती है दान भोग और नाश।
जैतपुर में चल रही भागवत कथा में ब्रह्मचारी निर्विकल्प स्वरूप जी महाराज उक्ताशय के प्रवचन देते हुए श्रद्धालुओं को बताया कि परमात्मा के दर्शनों के साथ ही जीव आत्मस्वरूप हो जाता है और उसके पाप नष्ट होते है परमात्मा के दर्शन का ही फल है जीव अपने सहज स्वरूप को प्राप्त हो जाता है । निर्विकल्प जी ने कहा कि हमारा सहज स्वरूप परमात्मा से भिन्न नहीं है परमात्मा का अंश ही जीव है मगर अपने सहज स्वरूप को भूल जाने के कारण अनेक प्रकार के दुख भोग रहा है तो उसका इस दुख से निकलने के लिए भगवान भी अवतार “धारण करते हैं भगवान सबके लिए सुलभ हो इसीलिए निर्गुण निराकार से सगुण साकार हो गए जो भगवान का निर्गुण निराकार का ध्यान नहीं कर सकते तो वह सगुण साकार का कर लें इसलिए भगवान भक्तों के कल्याण के लिए सगुण साकार भी बन जाते हैं भगवान भक्तों के आधीन हो जाते हैं और अपने भक्तों को सहज स्वरूप दे देते हैं अर्थात अपना स्वरूप प्रदान कर देते हैं।
आज कथा में लीलाधारी भगवान श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का प्रसंग सुनते हुए ब्रह्मचारी जी महाराज ने पूतना उद्धार, दैत्य, राक्षसों बकासुर, अघासुर, कालिया दमन, तृणावर्त, धेनुकासुर आदि के वध की कथा बड़े सरल रूप से जैतपुरवासी भगवद्बृन्दों को श्रवण कराई।

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