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172 वर्ष पूर्व स्थापित हुए थे सिवनी के बड़ेबाबा पार्श्वनाथ भगवान

जयपुर से नागपुर की ओर जा रही बैलगाड़ी सिवनी से आगे बढ़ी ही नही और भगवान यही विराजमान हो गए

पूरे भारत वर्ष में अपने विशाल श्वेत हिमालय सम शिखरों के लिये विख्यात गगन चुम्बी दिगंबर जैन मंदिर में विराजित चैतन्य चमत्कारी अतिशयकारी मूलनायक सिवनी के बड़ेबाबा भगवान पार्श्वनाथ स्वामी के प्रतिष्ठापना के 172 वर्ष पूर्ण हुए। माघ शुक्ल द्वितीया वर्ष 1853 को श्री जी की ग्यारह नाग फणावली से संयुक्त श्याम वर्ण की सुंदर पद्मासन प्रतिमा सिवनी में प्रतिष्ठापित कराई गई थी।
प्रतिष्ठापना समारोह के अवसर पर प्रात: श्री जी का भव्य महाभिषेक शांतिधारा एवं विशेष महापूजन श्रद्धालुओं द्वारा अत्यंत भक्ति भाव पूर्वक सम्पन्न की गई।

बड़े बाबा का प्रचलित इतिहास

सिवनी के बड़े बाबा से संबंधित ऐतिहासिक प्रचलित कथानक के अनुसार बड़े बाबा की यह मनोज्ञ प्रतिमा नागपुर के दिगंबर जैन समाज द्वारा जयपुर के एक दक्ष शिल्पकार से निर्मित कराई गई थी। ब्रिटिश काल का यह वह दौर था जब आवागमन एवं यातायात के साधन उतने सुलभ नही थे उस प्रतिकूल दौर में शिल्पकार भगवान पार्श्वनाथ स्वामी की प्रतिमा बैलगाड़ी पर रखकर जयपुर से अनेक स्थानों पर मुकाम करते हुआ अपने साथियों के साथ सिवनी पहुंचा। सांध्य काल की बेला थी अत: नागपुर मार्ग पर ही शिल्पकार ने पड़ाव डालकर रात्रि विश्राम किया।अगली सुबह बैलगाड़ी तैयार हुई और निकल पड़ी नागपुर की और किंतु कुछ कदम चलने के बाद बैलगाड़ी का पहिया टूट गया जैसे तैसे बढ़ई को खोजकर पहिया सुधरवाया गया पूरा दिन हो गया और रात्रि मुकाम पुन: सिवनी में हो गया और आश्चर्य अगले दिन पुन: बेलगाड़ी बढ़ी और दूसरा पहिया बेकाम हो गया ।

पुन: दिन भर पहिये की मरम्मत हुई और तीसरा रात्रि मुकाम सिवनी में हुआ। अगली सुबह बैलगाड़ी कुछ कदम चली और आज पुन: उसका कोई मुख्य भाग खराब हो गया मरम्मत में पुन: पूरा दिन व्यतीत कर शिल्पकार रात्रि में थक हार कर अपने डेरे में सो गया। अर्द्ध रात्रि के तीसरे पहर में गहन निद्रारत शिल्पकार को एक विचित्र स्वप्न आया जिसमें कोई अदृश्य शक्ति उसे चेता रही थी कि व्यर्थ परेशान मत हो प्रतिमा जी का स्थान आ गया है अब वे यहां से आगे नहीं बढ़ेगी। स्वप्न देखते ही उसकी तंद्रा भंग हुई और उसकी पूरी रात चिंता में जागते हुई ही बीती।

सुबह वह स्थानीय जैन समाज के पंचों के पास पहुंचा और सारी अपनी सारी व्यथा व स्थिति कह सुनाई किंतु सब व्यर्थ हर जगह से उसे नकार में ही उत्तर मिला।जैन समाज से हताश निराश हो वह वह अपने डेरे की ओर वापस हो ही रहा था कि देव योग से सिवनी के जैन जैनेतर समाज में पाहुने बाबा के नाम से विख्यात एवं प्रतिष्ठित श्रावक श्रेष्ठी से उसकी मुलाकात होजाती है और शिल्पकार उनसे सारी घटना का वृतांत कह डालता है सब कुछ सुनकर वह भद्र परिणामी पुरूष उसे प्रतिमा की निर्धारित न्योछावर राशि अदा कर प्रतिमा मन्दिर में पंच कल्याणक पूर्वक पूर्ण विधि विधान से विराजित करा देते है।

कहा जाता है भगवान के विराजित होते ही नगर में सुख समृद्धि धन धान्य वैभव की बढ़ोत्तरी होती है।जैन समाज का विस्तार होता है ।गगन चुम्बी जिनालयों की श्रृंखला बड़े बाबा के मंदिर के निर्माण के साथ ही प्रारंभ हो जाती है। विशाल जिनालयों के साथ श्री जिनेंद्र रजत रथ , छोटा जैन मंदिर, शास्त्र ग्रंथागार जैसी बहुमूल्य अनुपम धरोहरे सिवनी जैन समाज के वैभव को दर्शाती है।
कालांतर में गुरूओ की प्रेरणा से वर्तमान पीढ़ी द्वारा बड़े बाबा जी को रजत मय सुंदर वेदिका पर भव्यता से विराजित कराया गया है।

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