सद चित्त आनंद ही जीवन का सार : ब्रह्मचारी श्री निर्विकल्प स्वरूप जी
सिवनी यशो- श्रीमद भागवतपुराण में तीन स्तुतियाँ हैं, पहले जो ऋषियों के द्वारा की गई वह कर्म प्रधान है, दूसरी स्तुति भक्ति प्रधान है और तीसरी स्तुति में जो वेद स्तुति है वह ज्ञान प्रदान है। पूज्य पाद ब्रह्मचारी जी ने आज के प्रवचन में यह बताया कि हमारे भारतवर्ष में ज्ञान की प्रधानता है धन, पद, प्रतिष्ठा या आयु की प्रधानता नहीं है।
ब्रह्मचारी ने कथा में बताया कि वेद तीन कांड है कर्मकांड, उपासना कांड और ज्ञानकांड जिसमे प्राणी को वेदों का अध्ययन कर उसमें निहित अनुष्ठानों को कर कर्म करना चाहिए उसमें भी सकाम भाव से किया गया कर्म से केवल सुख की प्राप्ति होती जबकि निष्काम भाव से किया गया कर्म-अनुष्ठान से पुण्यो की प्राप्ति होती है, दूसरा उपासना कांड जिसमे प्राणी को अपने चित्त अर्थात मन को एकाग्र कर अंतःकरण पवित्र करना चाहिए तीसरा ज्ञानकांड जिसमे प्राणी ज्ञान प्राप्त करने का अधिकारी होकर अज्ञानता रूपी अंधकार का शमनकर ज्ञानवान हो जाता है।
ब्रह्मचारी जी ने कहा कि सनातन धर्म मे तीन ग्रन्थ प्रमुख है जिनकी समाज मे प्रधानता भी है, रामायण, गीता और भागवत तीनो के गुण भी अलग अलग है रामायण सद प्रधान है जिसमे भगवान श्री राम ने अपने चरित्र का अद्भुद प्रयोग किया है जिसमे उनके आचरण को जीवन मे उतारने की शिक्षा मिलती है ये मुख्य रूप से प्रयोग शास्त्र है दूसरा श्रीमद भगवत गीता जिसमे चित प्रधान है इसमें भगवान श्री कृष्ण ने योग में माध्यम से ज्ञान द्वारा परमात्मा का बोध कराया है, यह योग शास्त्र है, तीसरा श्रीमद भागवत इसमें आनंद प्रधान है इसमें भगवान ने वियोग और सयोग के माध्यम से प्रेम को दर्शया है यह वियोग शास्त्र है इस तरह तीनो शास्त्रों को मिलाकर सद-चित-आनंद होगया यही जीवन का सार है
सद्कर्म करने, करवाने और भागीदारी करने वाले पवित्र होते है – निर्विकल्प जी



