सनातन धर्म मूल रूप से आध्यात्मवादी है – शंकराचार्य सदानंद जी
शास्त्र सम्मत वर्ण आश्रम समाज व्यवस्था ही प्रमाणिक है- ब्रह्मऋषिरामकृष्णानंद
Seoni 13 December 2024
सिवनी यशो:- आध्यात्म का आश्रय लेने पर,काम, क्रोध, लोभ, आदि विकार नहीं व्याप्ते। मनुष्य देह और सद्गुरु प्राप्त होना, जन्म जन्मांतर के पुण्यो का फल है। यह देश उनका है जिसके धर्म शास्त्रों में अखण्ड भारत का उल्लेख है।
ऊक्ताशय के प्रेरक उद्गार अनन्त श्री विभूषित द्वारका शारदा पीठाधीश्वर जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती जी महाराज की गुरुधाम दिघौरी धर्म- सभा में प्रकाशित हुए ।
ज्ञातव्य है कि द्विपीठाधीश्वर जगतगुरु शंकराचार्य ब्रह्मलीन स्वामी श्री स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज द्वारा 42 वर्ष पूर्व श्री विद्यापीठ मंदिर झोंतेश्वर धाम में प्राण- प्रतिष्ठित श्रीमाता राजराजेश्वरी त्रिपुर सुंदरी एवं भगवती बाला भवानी गणेशगंज मंदिर तथा ब्रह्मलीन महाराज श्री की प्रतिमाओं से विराजित तीन रथों की दिव्य शोभायात्रा का , गुरु रत्नेश्वर धाम दिेघोरी में भव्य स्वागत हुआ।
इस अवसर पर गुरु रत्नेश्वर मंदिर प्रांगण में विशाल धर्म -सभा का आयोजन किया गया। धर्मसभा को संबोधित करते हुए जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी श्री सदानंद सरस्वती जी ने अपने मंत्रमुग्ध प्रवचन में कहा कि, सनातन धर्म मूल रूप से आध्यात्म वादी है। आध्यात्मिक विद्या का आश्रय लेने वाले व्यक्ति को काम,क्रोध,लोभ, अहंकार,आदि मनोविकार नहीं व्याप्ते । अहंकार दूर करने परमात्मा अवतार लेते हैं। न केवल मनुष्य वरन इंद्र आदि देवताओं के अहंकार का नाश करने परमात्मा प्रकट हो जाते हैं।
प्रसंगवश आप श्री ने कहा कि हनुमान जी एवं रावण दोनों में अपार बाल था, रावण को अपने बल और शक्ति का अहंकार था । आत: है उसे अपकीर्ति और नाश की प्राप्ति हुई ।किंतु बल बुद्धि विवेक की त्रिमूर्ति श्री हनुमान- सेवाभावी, विनम्र रामभक्त तथा अपने सभी कार्य राम की कृपा मानकर भक्त शिरोमणि और चिरंजीव हुए ।
प्रवचन को विस्तार देते हुए शंकराचार्य स्वामी श्री ने देश के वर्तमान ज्वलंत विषय अखण्ड भारत पर कहा कि ,अखण्ड भारत को साकार करने ,हमें देश के इतिहास ,गुण धर्म तथा स्वरूप की विस्तृत जानकारी होना चाहिए। प्रमाणिक जानकारी हमें मोबाइल के गूगल गुरु अथवा व्हाट्सएप से नहीं प्राप्त हो सकती। स्कूल एवं शैक्षणिक संस्थानों में भी देश के वास्तविक इतिहास को नहीं पढ़ाया जाता। अखंड भारत के इतिहास और स्वरूप का उल्लेख हमारे, धर्म शास्त्रों वेद और पुराणों में विस्तार से मिलता है। आप श्री ने कहा कि वास्तव में यह देश मूल रूप से उनका ही है जिनके प्राचीन धर्म शास्त्रों में भारत का उल्लेख मिलता है।
धर्म सभा को संबोधित करते हुए अग्निपीठ ब्रह्म ऋषि आचार्य महामंडलेश्वर श्री राम कृष्णानंद जी ने देश में जाति- पाति के ज्वलंत विषय पर अपने ओजस्वी उद्बोधन में कहा कि सनातन धर्म के शास्त्रों में उल्लेखित सामाजिक वर्ण आश्रम समाज व्यवस्था ही व्यवहारिक ,प्राकृतिक, एवं अनुभूत और प्रामाणिक व्यवस्था है। इसी के कारण भारतीय संस्कृति करोड़ों वर्ष से अक्षुण जीवंत और विश्व में सर्वोच्च मानी जाती है। विश्व की अन्य पुरानी संस्कृतिया अब समाप्त और विलुप्त हो चुकी हैं। अत: भौतिकवाद तथा पाशचात्य भोग संस्कृति के प्रभाव में भारतीय संस्कृति के मूल स्वरूप से खिलवाड़ आत्मघाती होगा।
धर्म सभा को ज्योतिष पीठ पंडित श्री रवि शंकर शास्त्री जी, पंडित श्री राजेंद्र शास्त्री, आचार्य सच्चिदानंद द्विवेदी वृंदावन ,ने भी संबोधित किया।
गुरुधाम की धर्म सभा में- गीता मनीषी पूज्य ब्रह्मचारी श्रीनिर्विकल्प स्वरूप ,आचार्य सनत कुमार उपाध्याय ,ब्रह्मचारी राघवानंद ,ब्रह्मचारी रमेशानंद ,गुरु परिवार से- पंडित ओमप्रकाश/शिवा तिवारी, पं.अनुराग/नीलू त्रिपाठी, आशा देवी सनोडिया, चंद्रभानसिंह बघेल, ददुआ पटेल बाधी, यदुनंदन सनोदिया ,मंगल बघेल ,रमेश चौहान छपारा ,प्रदीप राय, बलराम पटेल घोंटी, लोमेश शर्मा ,सुमन डेहरिया, राजू पाठक ,राजू यादव, सागर उपाध्याय, संजय उपाध्याय ने समस्त श्रद्धालु जनों की ओर से पूज्य शंकराचार्य का पादुका पूजन कर माल्यार्पण किया। धर्म सभा में बड़ी संख्या में गुरु भक्त श्रद्धालु नर-नारी उपस्थित रहे । धर्म सभा का संचालन एवं कृतज्ञता ज्ञापन ब्राह्मण समाज पूर्व अध्यक्ष पंडित ओमप्रकाश तिवारी द्वारा किया गया। धर्म की जय हो अधर्म का नाश हो प्राणियों में सद्भावना हो विश्व का कल्याण हो।





