सनातन हिंदू धर्म की दस विशेषताएं है जो विश्व के किसी अन्य पंथ, मजहब में नही है – निर्विकल्प जी
Seoni 24 December 2024
सिवनी यशो:- श्रीमद भगवतगीता केवल निर्वाण दात्री ही नहीं है निर्माण कत्री भी है, यह मोक्षदायिनी गीता मुक्ति तो देती ही है पर निर्माण भी करती है, सच्चरित्र और सदाचार का निर्माण करती है, भगवद् गीता हमको अपना जीवन कैसे जीना चाहिए यह सिखाती है, उच्चचरित का निर्माण करने वाली है यह भगवद् गीता इसका जो पठन-पाठन करता है श्रवण-मनन करता है उसके जीवन में भी सदाचार आ जाता है वही सदाचार उसकी वाणी से भी छलकता है वही सदाचार उसके आचरण से भी दृष्टिगत होता है वही सदाचार उसके मन को भी पवित्र करता है।

उक्ताशय के प्रवचन ब्रह्मचारी श्री निर्विकल्प स्वरूप जी महाराज ने आज गीता सत्संग महोत्सव के विश्राम दिवस में कही पूज्य महाराज श्री ने कहा कि सनातन हिंदू धर्म की दस विशेषताएं है जो विश्व के किसी अन्य पंथ, मजहब में नही है, पहला हमारे धर्म में 16 संस्कार होते हैं जो किसी धर्म में नहीं होते यहां तक कि हमारे सनातन धर्म में मरने के बाद भी संस्कार होते हैं यही हमारे धर्म की विशेषता है, दूसरी विशेषता है वर्णाश्रम जो एकमात्र सनातन हिंदू धर्म में ही है इसमें ब्रह्मचर्य,गृहस्थ,वानप्रस्थ,सन्यास शामिल है, तीसरी विशेषता- पुनर्जन्म अर्थात मरने के बाद फिर से कर्म के अनुसार जन्म होता है, चौथी विशेषता है अवतारवाद अर्थात सनातन धर्म मे ही भगवान अवतार लेते हैं यह केवल भारत में ही होता है, पांचवी विशेषता- यज्ञ संस्कृति यह जो यज्ञ के द्वारा परमात्मा को प्राप्त करना यह सनातन धर्म में है, छठी विशेषता वेदों की अपौरुषेयता ये हमारे हिंदू धर्म का मूल ग्रंथ वेद से संबंधित है यह किसी व्यक्ति द्वारा निर्मित नहीं है वेद स्वयंभू हैं, सातवीं विशेषता- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष यह चार पुरुषार्थ जो यह केवल हिंदू धर्म में है।

आठवां है पातिव्रत धर्म-जो नारियां अपने पति को ही सब कुछ मानती हैं वह पतिव्रता कहलाती हैं ऐसा पातिव्रत धर्म सनातन धर्म में है विश्व में कहीं ऐसा पतिव्रत धर्म की चर्चा नहीं है, नवमी विशेषता- नारी की पूजा केवल सनातन हिंदू धर्म में होती है कन्या पूजन नवरात्रि में सुहागन जब होती हैं तब सुभाषिनी पूजन । जो नारी की पूजा सनातन धर्म में होती है और दसवीं विशेषता-अद्वैतवाद जिसका मतलब है जीव और ब्रह्म यह दोनों एक है दुनियाँ का ऐसा कोई सिद्धांत नहीं है जो अद्वैतवाद का प्रतिपादन करता हो एकमात्र भारत का सनातन धर्म है, जो वासुदेवस्य सर्वम् की घोषणा करता है। अहम् ब्रह्मस्मि! में ब्रह्म हूं ऐसा किसी अन्य मजहब में कह दो तो गर्दन कट जाएगी आप नहीं कह सकते मैं गॉड हूं जबकि हमारे हिंदू धर्म में तो कह दिया शिवोहम शिवोहम शिवोहम।
आज महाराज श्री के प्रवचनों के उपरांत गीता सत्संग महोत्सव में पधारे जिला पुलिस अधीक्षक सुनील मेहता जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि हम सब के जीवन मे कभी ना कभी तुलसीदास जी, मीराबाई किसी ना किसी रूप में आते ही है, वे उस परमपिता से जुडऩे के बीज तो हमारे जीवन मे बो देते है पर हमें स्वयं से उस परमपिता को पाने के लिए प्रयत्न करना चाहिए जिसके लिए हमारे अंदर उस तत्व को जानने के लिए आग लगनी चाहिए , गीता जी एक मात्र वह ग्रन्थ है जिसमे उस परमपिता की पूरी जानकारी है, कि वह कैसा है, कैसे चलता है, कैसे रहता है, कैसे खाता है और कैसे उसकी कृपा हमे मिलेगी, और इस तरह हम गीता जी के मर्म को जान सकते है।
श्री मेहता जी कहा कि हमारे अंदर यह उत्कंठा होनी चाहिए कि जिस ईश्वर के हम भक्त है जिसकी हम पर परम् कृपा है वह चाहता क्या है हम उसे कैसे प्रसन्न रख सकते है यद्यपि हम ईश्वर प्रसन्नता के लिए कुछ ना कुछ प्रयोजन करते रहते है तथपि हमे यह ज्ञात होंना चाहिए कि ईश्वर कैसे प्रसन्न होता है तो आपको गीता का अध्ययन करना चाहिए उसमें ईश्वर कि प्रसन्नता उपाय है। श्री मेहता जी ने सनातन धर्म की खूबी बताते हुए कहा कि बहुते लोग कहते है कि अंतिम संस्कार में जो दाह संस्कार होता है उससे प्रदूषण फैलता जबकि दाह संस्कार से अच्छा कोई भी अंतिम संस्कार नही हो सकता क्योंकि यह शरीर पांच महाभूतों जल, पृथ्वी, वायु, आकाश, अग्नि से बना हुआ है और दाह संस्कार के दौरान यह शरीर इन्ही पंचमहाभूतों में मिल जाता है, हम सभी अपने सनातनी होने पर गर्व होना चाहिये।
मंच से महाराज श्री ने इस सफल आयोजन का श्रेय अपने ब्रह्मलीन पूज्य गुरुदेव द्विपीठाधीश्वर जगतगुरु शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज को देते हुए आयोजन से सम्बंधित सभी सहयोगियों और जिले की प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को शुभ आशीर्वाद दिया ।
प्रवचन विराम के साथ आज गंगा आरती की तर्ज पर गीता जी महाआरती नगर के ही पंडित पार्थ और पंडित दिव्यांश द्वारा की गई तथा श्रद्धालुओ ने महाप्रसाद भंडारा ग्रहण किया।


