भुजलिया: प्रकृति की पूजा से लेकर वीरता के विजयगान तक
भुजलिया : प्रकृति, परंपरा और शौर्य की अनूठी लोक-गाथा
भुजलिया पर्व: प्रकृति, शौर्य और सामाजिक समरसता की अनूठी लोकपरंपरा
हेमेन्द्र क्षीरसागर
पत्रकार, लेखक एवं स्तंभकार, बालाघाट (म.प्र.)
Balaghat 28 August 2026
मध्य भारत, विशेषकर बुंदेलखंड, महाकौशल, छत्तीसगढ़ और मालवा अंचल में रक्षाबंधन के अगले दिन भाद्रपद प्रतिपदा को मनाया जाने वाला भुजलिया, भुजरिया या कजलिया पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं है। यह प्रकृति-पूजन, कृषि-संस्कृति, लोकआस्था, वीरता और सामाजिक समरसता का ऐसा जीवंत लोक-उत्सव है, जिसमें सदियों पुरानी परंपराएं आज भी सांस लेती दिखाई देती हैं।
भुजलिया हमें मिट्टी से जोड़ता है, प्रकृति के प्रति कृतज्ञ होना सिखाता है और साथ ही यह संदेश देता है कि सामाजिक रिश्तों में आई कटुता को भुलाकर भाईचारे को मजबूत किया जाए। यही कारण है कि यह पर्व केवल पूजा और विसर्जन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि लोकजीवन के अनेक रंगों को अपने भीतर समेटे हुए है।

लोकसंस्कृति की अटूट आस्था
भुजलिया पर्व की जड़ें सीधे मिट्टी और किसान जीवन से जुड़ी हैं। श्रावण मास की अष्टमी या नवमी को टोकरियों में मिट्टी बिछाकर गेहूं अथवा जौ के बीज बोए जाते हैं। कुछ दिनों बाद इनमें निकलने वाले हरे-भरे अंकुरों को भुजरिया या कजलिया कहा जाता है।
लोकमान्यता में इन अंकुरों को आने वाली फसल, वर्षा, उर्वरता और समृद्धि का शुभ संकेत माना जाता है। जिस प्रकार एक छोटा-सा बीज मिट्टी का स्पर्श पाकर अंकुरित होकर जीवन का संदेश देता है, उसी प्रकार भुजलिया पर्व भी प्रकृति और मानव जीवन के परस्पर संबंध का प्रतीक बन जाता है।
विसर्जन के अवसर पर महिलाएं और बालिकाएं पारंपरिक लोकगीत गाते हुए भुजरियों का पूजन करती हैं और उन्हें जलाशयों में विसर्जित करती हैं। इस पूरी परंपरा में जल, भूमि और कृषि के प्रति लोकसमाज की गहरी आस्था और सम्मान सहज रूप से दिखाई देता है।
परंपरा में रचा-बसा शौर्य
भुजलिया पर्व के साथ बुंदेलखंड के वीरता से भरे इतिहास की लोकगाथाएं भी जुड़ी हुई हैं। लोकमान्यताओं में इसका संबंध महोबा के ऐतिहासिक संघर्ष और वीर आल्हा-ऊदल की शौर्य परंपरा से जोड़ा जाता है।
कहा जाता है कि 12वीं सदी के महोबा संघर्ष के दौरान मातृभूमि, स्वाभिमान और सम्मान की रक्षा के लिए आल्हा, ऊदल, मलखान और अन्य वीर योद्धाओं ने अदम्य साहस का परिचय दिया। युद्ध में विजय के बाद कजलियों के माध्यम से वीरों के स्वागत की परंपरा विकसित होने की मान्यता लोकस्मृति में आज भी जीवित है।
इतिहास और लोककथा के बीच भले ही कई प्रसंगों के अलग-अलग रूप मिलते हों, लेकिन इतना निश्चित है कि भुजलिया की लोकपरंपरा में वीरता, स्वाभिमान और विजय की स्मृति गहराई से रची-बसी है। यही कारण है कि यह पर्व केवल प्रकृति के प्रति आभार का उत्सव नहीं, बल्कि लोकसमाज के आत्मसम्मान का प्रतीक भी बन गया।
कजलिया मिलन : रिश्तों को जोड़ने की परंपरा
भुजलिया पर्व की सबसे सुंदर और मानवीय परंपराओं में से एक है ‘कजलिया मिलन’।
भुजरिया विसर्जन के बाद लोग एक-दूसरे को भुजरिया के तिनके भेंट करते हैं। बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लिया जाता है और हमउम्र लोग आपस में गले मिलते हैं। लोकमान्यता है कि यदि किसी व्यक्ति से कोई मनमुटाव, नाराजगी या व्यक्तिगत कटुता हो तो इस अवसर पर भुजरिया देकर उसे समाप्त किया जा सकता है।
यानी भुजलिया केवल खेत और प्रकृति से जुड़े रिश्तों को ही नहीं, बल्कि मनुष्य से मनुष्य के रिश्तों को भी सींचने का पर्व है।
जाति, वर्ग और सामाजिक भेद की दीवारों से ऊपर उठकर एक-दूसरे से मिलना और पुराने गिले-शिकवे भुलाना इस पर्व की सबसे बड़ी सामाजिक शक्ति है। आज जब समाज में संवाद की जगह दूरी और संबंधों में आत्मीयता की जगह औपचारिकता बढ़ती जा रही है, तब कजलिया मिलन जैसी परंपराएं सामाजिक समरसता की महत्वपूर्ण मिसाल बनकर सामने आती हैं।
प्रकृति से जुड़ने का लोक-संदेश
भुजलिया की परंपरा को यदि गहराई से देखा जाए तो इसमें पर्यावरण संरक्षण का सहज लोकदर्शन भी दिखाई देता है। मिट्टी में बीज बोना, अंकुरों को विकसित होते देखना, जलाशय तक उन्हें ले जाना और जल में विसर्जित करना—यह पूरी प्रक्रिया मनुष्य को प्रकृति के चक्र से जोड़ती है।
यह पर्व बताता है कि हमारा जीवन मिट्टी, जल, बीज और कृषि से अलग नहीं है। किसान के लिए अंकुरित होता बीज केवल पौधा नहीं, बल्कि भविष्य की उम्मीद है। हरी भुजरिया उसके लिए आने वाली समृद्धि का सपना है।
आज के दौर में और अधिक प्रासंगिक
तकनीक और भौतिकता के इस दौर में जब नई पीढ़ी तेजी से अपनी लोकपरंपराओं से दूर होती जा रही है, तब भुजलिया जैसे पर्वों का महत्व और बढ़ जाता है।
यह पर्व हमें हमारी सांस्कृतिक जड़ों की याद दिलाता है। यह सिखाता है कि प्रकृति का सम्मान करें, मिट्टी की कद्र करें, अपने इतिहास के शौर्य को याद रखें और सामाजिक रिश्तों में आई दूरियों को प्रेम से समाप्त करें।
भुजलिया इसलिए महज एक त्योहार नहीं है। यह मिट्टी की महक, किसान की उम्मीद, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, वीरता की स्मृति और सामाजिक भाईचारे का लोक-संस्कार है।
जरूरत इस बात की है कि बदलते समय के साथ इस परंपरा को केवल रस्म के रूप में न निभाया जाए, बल्कि इसके पीछे छिपे मूल संदेश को भी अगली पीढ़ी तक पहुंचाया जाए।
कजलिया के छोटे-से अंकुर में दरअसल हमारी लोकसंस्कृति की बड़ी कहानी छिपी है—प्रकृति से प्रेम की, शौर्य और स्वाभिमान की, और सबसे बढ़कर मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने वाली आत्मीयता की।
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